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राजस्थान में कांग्रेस ने दलितों को लगाया ठिकाने, चौंकाने वाली रिपोर्ट आई सामने

दलित हितैषी होने का दावा करने वाली कांग्रेस की सरकार ने राजस्थान में शासन-प्रशासन में दलितों को कितनी भागीदारी दी है? आंकड़ों के साथ एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है।

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चिंतन शिविर से ठीक पहले राजस्थान के दलित संगठनों ने संयुक्त रूप से एक श्वेत पत्र जारी की है। रिपोर्ट वायरल हो रही है।

यूपी, पंजाब समेत 5 राज्यों के चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस अब इमेज मेकओवर के लिए बड़ी तैयारी कर रही है। इसकी शुरुआत उदयपुर में 13 से 15 मई तक होने वाले चिंतन शिविर से होगी। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस नेताओं का एक धड़ा इस शिविर में ओबीसी, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों के लिए पार्टी में 50 फीसदी आरक्षण की मांग कर सकता है। यानी कांग्रेस पार्टी के भीतर ही SC-ST, OBC और माइनॉरिटी के लिए 50 % आरक्षण का कार्ड चला सकती है।

चिंतन शिविर से पहले वायरल हुई रिपोर्ट 

लेकिन इस चिंतन शिविर से पहले राजस्थान के दलितों की नाराज़गी सामने आई। चिंतन शिविर से ठीक पहले राजस्थान के दलित संगठनों ने संयुक्त रूप से एक श्वेत पत्र जारी करके राजस्थान की कांग्रेस सरकार में सत्ता, संगठन और प्रशासन में दलितों की कम भागीदारी पर सवाल उठाया है। सोशल मीडिया पर एक रिपोर्ट वायरल हो रही है जिसमें ये जाति के हिसाब से राजस्थान सरकार में मंत्रियों और अफसरों के साथ-साथ कांग्रेस संगठन में दलितों की भागीदारी के आंकड़े बताए गए हैं। इस रिपोर्ट ने कांग्रेस की नींद उड़ा दी है।

श्वेत पत्र में सरकार, शासन में दलितों की हिस्सेदारी का जिक्र 

यह अपनी तरह की पहली रिसर्च रिपोर्ट है जो इस बात की तरफ इशारा करती है कि दलित हितैषी होने का दावा करने वाली पार्टी और सरकार दलितों को अवसर प्रदान करने में कैसे बच रही है, इससे ये भी पता चलता है कि 36 कौम के नेता होने का दावा करने वाले अधिकांश नेताओं को दलितों पर यकीन नहीं है। वे अपने निजी स्टाफ से लेकर OSD और गनमेन से लेकर ड्राइवर तक दलित समुदाय से लेना पसंद नहीं करते हैं।

इतना ही नहीं बल्कि ब्यूरोक्रेसी के उच्च स्तर यानी मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिव और प्रिंसिपल सेक्रेटरी जैसे अहम पदों पर भी दलितों को भागीदारी देने से बचने की कोशिश की जा रही है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खुद ओबीसी समाज से आते हैं और ज़ोर देकर खुद को दलित हितैषी बताते हैं लेकिन जो आकंड़ें सामने आए हैं, उससे उनके फर्ज़ी दलित प्रेम की हवा निकल गई है।

किसी भी समाज को मजबूत बनाने के लिए उसे सत्ता, शासन और संगठन में भागीदारी देनी होती है लेकिन ये रिपोर्ट दिखाती है कि अशोक गहलोत को दलितों ना ही टैलेंट नज़र आ रहा है और ना ही उन्हें दलितों पर भरोसा है। आइये जानते हैं उनके राज में दलितों को कितनी भागीदारी मिली है ?

मुख्यमंत्री कार्यालय और निवास

किसी सूबे में सत्ता का असली केंद्र सचिवालय, मुख्यमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री के घर को माना जाता है क्योंकि यहीं से राज्य को चलाने वाला हर फैसला लिया जाता है। इस वायरल रिपोर्ट में दी गई सूचि देखने पर पता चलता है कि मुख्यमंत्री ने 8 OSD नियुक्त कर रखे हैं जिसमें 4 ब्राहमण, 3 अन्य पिछड़ा वर्ग और एक अल्पसंख्यक समुदाय से है। यानी अशोक गहलोत साहब एक भी अनुसूचित जाति समुदाय के व्यक्ति को अपना विशेषाधिकारी बनने लायक नहीं समझते हैं, वे उन तबको पर भरोसा जताते हैं जिन तबकों का कांग्रेस पर कोई भरोसा नजर नहीं आता है।

ब्यूरोक्रेसी में मुख्यमंत्री कार्यालय में मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव की सबसे पावरफुल पोस्ट पर कुलदीप रांका बिराजमान हैं, वे जैन समुदाय से आते हैं। मुख्यमंत्री के अन्य निजी सचिवों पर नज़र डालें तो वहां भी 1 ओबीसी और दो सामान्य वर्ग के अफसर दिखते हैं। संयुक्त सचिव में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के साथ विशेष पिछड़ा वर्ग के गौरव बजाड़ और अल्पसंख्यक समुदाय के शाहीन अली खान नजर आते हैं। अनुसूचित जाति से महज अजय असवाल जैसे अधिकारी की नियुक्ति दिखती है।

अगर सीएमओ और सीएमआर में तैनात सभी अधिकारी-कर्मचारियों की लिस्ट का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि सबसे ज्यादा सामान्य वर्ग के लोग इस पावर सेंटर पर काबिज़ है और दूसरे स्थान पर डोमिनेंट ओबीसी के लोग है। सत्ता के सेंटर्स में दलित समुदाय से 5 फीसद लोग भी नहीं है। और शायद इसीलिए इस हाई लेवल पर दलितों और उनके मुद्दों के प्रति कोई संवेदनशीलता दिखाई नहीं पड़ती है। राजस्थान में दलितों के खिलाफ अपराध में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है लेकिन जहां आपके लोग हैं ही नहीं, वहां आपकी बात भला कौन करेगा ?

दलित अधिकारियों की फील्ड पोस्टिंग 

अशोक गहलोत सरकार में सिर्फ सचिवालय, सीएम ऑफिस और आवास पर ही दलित गायब नहीं हैं बल्कि 18 फ़ीसदी आबादी वाले अनुसूचित जाति समुदाय के आईएएस और आईपीएस अधिकारियों में से ज्यादातर को कम महत्वपूर्ण और नॉन फील्ड पोस्टिंग दी गई है। अनुसूचित जाति के ज्यादातर आईपीएस को या तो पुलिस मुख्यालय में पोस्टिंग मिली हुई है या फिर वो होम गार्ड और ट्रेनिंग जैसे महकमों में खप रहे हैं। अशोक गहलोत सरकार उन्हें फील्ड पोस्टिंग देने से भरपूर बच रही है।

मज़बूरी में या सिर्फ दिखाने के लिये 4 जिलों में एसपी और 6 जिलों कलेक्टर के पदों पर भी दलित बैकग्राउंड से आने वाले अफसरों को नियुक्ति दी गई है। जिला कलेक्टर के रूप में अजमेर में अंशदीप, करौली में अंकित कुमार सिंह, बूंदी में रेणु जयपाल, भरतपुर में आलोक रंजन, जैसलमेर में प्रतिभा सिंह और नागौर में पीयूष सामरिया पोस्टेड हैं और एसपी के रूप में भीलवाड़ा के पुलिस अधीक्षक आदर्श सिद्दू, झालावाड में मोनिका सेन, सीकर के एसपी कुंवर राष्ट्रदीप और कोटा ग्रामीण में कवीन्द्र सागर के नाम सामने आते हैं, जबकि 33 जिलों में कम से कम 6 जिलों की तरह ही एसपी भी लगने चाहिए।

स्टेट कैडर में पांच लोगों को आरएएस से प्रमोट करके आईएएस बनाया गया है लेकिन उनमें से एक को भी फील्ड पोस्टिंग नहीं दी गई है।

राज्य मंत्रीमंडल में भागीदारी

अफसरों की बात हो रही है तो मंत्रियों का जिक्र भी कर ही लेना चाहिए। आपको ये भी जानना चाहिए कि अशोक गहलोत सरकार में कितने दलितों को मंत्री बनाया गया है? वैसे कहने के लिये तो आज़ादी के बाद राजस्थान की राजनीति में पहली बार अनुसूचित जाति के चार कैबिनेट मिनिस्टर बनाये गये हैं, जिनमें ममता भूपेश, भजन लाल जाटव, टीका राम जूली और गोविन्द राम मेघवाल को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है।

आज़ादी के बाद ये पहला मौका है जब सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता विभाग के साथ सार्वजनिक निर्माण विभाग, महिला और बाल आधिकारिता विभाग और प्रशासनिक, नीति निर्धारण जैसे विभाग दलित मंत्रियों को दिए गए। अशोक गहलोत ने किसी दलित को राज्य मंत्री नहीं बनाया है।

कांग्रेस से अनुसूचित जाति के 19 विधायक है और एक विधायक बाबु लाल नगर निर्दलीय हैं, लेकिन सरकार को समर्थन कर रहे हैं, इस तरह कुल 20 विधायक हैं जो कुल विधायकों का सिर्फ 10 प्रतिशत है।

बोर्डों, निगमों और समितियों में दलितों की स्थिति 

किसी राज्य में मंत्रियों और अफसरों के अलावा उस राज्य के बोर्डों, आयोगों और निगमों की कुर्सी पर बैठने वाले लोग भी बहुत ताकतवर होते हैं। उन्हें मंत्रियों की तरह ही तमाम सुख-सुविधाएं मिलती हैं। वहां दलितों की क्या हालत है, वो भी देख लेते हैं। लिस्ट कहती है कि राजस्थान सरकार के 3 साल पूरे होने के बाद अशोक गहलोत सरकार ने तीन चरणों में अब तक 125 लोगों को अलग-अलग आयोगों, बोर्डों, निगमों और समितियों में राजनीतिक नियुक्ति दी है।

गहलोत सरकार ने अब तक सिर्फ 11 दलितों को ही यहां नियुक्त किया है। वायरल रिपोर्ट में दी गई लिस्ट देखिए

लेकिन इस लिस्ट को देखने पर पता चलता हैं कि गहलोत सरकार ने अब तक सिर्फ 11 दलितों को ही यहां नियुक्त किया है जबकि आबादी के अनुपात में कम से कम 23 लोगों को नियुक्त किया जाना चाहिए था। और जिन लोगों को नियुक्तियां मिली हैं, उनको या तो अनुसुचित जाति आयोग, अनुसूचित जाति वित्त विकास निगम, सफाई कर्मचारी आयोग और अम्बेडकर पीठ जैसे महकमों में नियुक्त किया गया है, क्योंकि इन जगहों पर इन्हीं समुदायों किसी की नियुक्ति हो सकती है।

इसे आप सरकार की मजबूरी कह सकते हैं। क्योंकि अगर ऐसा ना होता तो SC कमीशन से लेकर सफाई कर्मचारी आयोग तक में भी सवर्णों या डोमिनेंट ओबीसी के लोग नियुक्त कर दिए गए होते। राज्य की कांग्रेस सरकार ने अन्य महत्वपूर्ण राजनीतिक नियुक्तियों से दलितों को पूरी तरह से दूर रखा है। तीन लोगों को समितियों, बोर्ड और आयोग में सदस्य बनाया है, जिनका न कोई दफ्तर है और न ही कोई अधिकार, उन्हें केवल नाम मात्र की नियुक्ति देकर महज खाना पूर्ति कर ली गई है, इस तरह राजनीतिक नियुक्तियों में भी दलितों की हिस्सेदारी सुनिश्चित नहीं हो पाई है।

गौरतलब बात यह भी है कि राज्य सरकार ने 45 अध्यक्ष बनाये हैं, जिनमें से महज 3 दलित हैं और इसी तरह उपाध्यक्ष भी 3 ही बनाये गये हैं। विभिन्न बोर्ड समितियों में 68 कुल सदस्यों में महज पांच सदस्य अनुसूचित जाति के नियुक्त हुये हैं, इससे भी गंभीर बात यह है कि राजनीतिक नियुक्तियों में 30 लोगों को मंत्री का दर्जा दिया गया है, जिसमें 3 को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है, इसमें एक भी दलित नहीं है और 27 राज्य मंत्रियों में सिर्फ शंकर लाल यादव को राज्य मंत्री का दर्जा दिया गया है, जबकि कई अन्य समुदायों में एक ही जाति के बहुत से लोगों को मंत्री का दर्जा प्राप्त हुआ है और उनको सरकारी सुख सुविधाएँ दी गई है। अब आप अशोक गहलोत जी से पूछिए, ऐसा क्यों हुआ? किसने किया? किसके कहने पर किया?

कांग्रेस संगठन में अनुसूचित जाति की भागीदारी 

अब तक तो आपने राजस्थान सरकार और प्रशासन में दलितों की हालत के बारे में जाना, अब बात करते हैं कांग्रेस पार्टी के अपने अंदरूनी संगठन के बारे में, ये जानना बेहद जरूरी है कि कांग्रेस ने पार्टी के भीतर कितने दलित नेताओं को जगह दी है। वायरल रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष, कोषाध्यक्ष और प्रवक्ता के रूप में कोई भी दलित नामित नहीं हैं, यहाँ तक कि प्रदेश में लम्बे समय से कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष का पद खाली पड़ा है लेकिन उस पर कोई नियुक्ति नहीं की गई है।

वर्तमान प्रदेश कार्यकारिणी के 7 उपाध्यक्षों में सिर्फ 1 गोविन्द राम मेघवाल को उपाध्यक्ष बनाया है, 8 महासचिवों में 2 महासचिव प्रशांत बैरवा और वेद प्रकाश सोलंकी है, 24 सचिवों में भी 2 सचिन सरवटे और शोभा सोलंकी दलित बैकग्राउंड से हैं। कांग्रेस संगठन में 44 पदाधिकारियों में सिर्फ 5 दलितों को जगह मिल पाई है, यही हाल जिलाध्यक्षों का है। कुल 33 प्रशासनिक जिले हैं और काफी ग्रामीण जिले बनाये गये हैं, कुल मिलाकर 40 जिलाध्यक्षों में 3 दलितों को जिलाध्यक्ष के रूप में कमान सौंपी गई है।

उनमें से एक बूंदी के जिलाध्यक्ष सी एल प्रेमी भी है जो पार्टी से ही निष्कासित है, जो लोग पदाधिकारी बनाये गये हैं, उनमें से अधिकतर मंत्री, विधायक या राजनीतिक नियुक्तियों के लाभार्थी है, जिसके चलते दलितों का प्रतिनिधित्व सिकुड़ता जा रहा है। राजस्थान में कांग्रेस संगठन में दलितों के प्रतिनिधित्व को देखकर यह साफ हो जाता है कि पार्टी को दलितों के वोट तो थोक में चाहिए लेकिन उनको संगठन में भागीदारी दे कर नेता बनाना मंजूर नहीं है। यानी वोट हमारा और राज तुम्हारा… राजस्थान में कांग्रेस इसी मंत्र पर चल रही है।

राज्य बजट में दलितों की हिस्सेदारी

राजस्थान सरकार ने दलित आदिवासी समुदाय के सर्वांगीण विकास के लिये एक स्पेशल कानून लाने का हौंसला दिखाया है, लेकिन अनुसूचित जाति उप योजना के तहत आवंटित होने वाला बजट काफी कम है। ये दलितों की आबादी के अनुपात में नहीं तो बिल्कुल नहीं है। साल 2019-20 में राजस्थान का अनुमानित बजट 2 लाख 18 हज़ार 222.1 करोड़ था लेकिन अनुसूचित जाति को उप-योजना के नाम पर सिर्फ 13 हज़ार 789.2 करोड़ रुपये ही मिले। यानी यहां भी गहलोत सरकार खेल कर गई।

2 अप्रैल 2018 आन्दोलन के केस वापस नहीं लिए

2 अप्रैल 2018 को एससी-एसटी एक्ट को बचाने के लिए देश भर में जबरदस्त आंदोलन हुआ था। राजस्थान में उस वक्त बीजेपी की सरकार थी और दलित प्रदर्शनकारियों पर सैकड़ों मुकदमें दर्ज़ किए। हजारों लोग गिरफ्तार हुए, इन मुकदमों और दमन करने वाली कार्यवाही से दलित-आदिवासी वर्ग के लोग वसुंधरा राजे सरकार से बेहद नाराज हुए और उन्होंने डिफिट बीजेपी अभियान चलाकर भाजपा को सत्ता से बेदखल करने में अहम भूमिका निभाई।

चुनाव के दौरान कांग्रेस के आला नेताओं ने दलित-आदिवासी कार्यकर्ताओं को भरोसा दिलाया था कि अगर कांग्रेस की सरकार आई तो सभी मुक़दमें वापस ले लिये जाएंगे। कांग्रेस पर दलित-आदिवासी समुदाय के लोगों ने भरोसा जताया, उन्होंने यकीन किया कि कांग्रेस सरकार मुकदमें वापस ले लेगी लेकिन सत्ता में आने के लगभग साढ़े तीन साल बीत जाने के बावजूद अभी तक सभी मुकदमें वापस नहीं लिये जा सके हैं।

RTI में मिले जवाब में पता चला कि अब तक सिर्फ 87 केस वापस लिए गए हैं।

सूचना के अधिकार कानून के तहत मिली जानकारी के मुताबिक कुल 322 मुकदमें दर्ज किये गये, जिनमें 129 प्रकरणों में चालान किया जा चुका है। 180 प्रकरणों में FR लग चुकी है और 13 मामलों में अभी भी जांच चल रही है। राजस्थान सरकार ने अभी तक केवल 87 मुकदमें वापस लिये हैं। इस तरह हम देख सकते हैं कि दलित आन्दोलनकारियों को राहत देने में सरकार की उदासीनता साफ नजर आती है, जबकि दलित आदिवासी समुदाय के मंत्री, विधायक और विभिन्न सामाजिक संगठन सभी मुकदमें वापस लेने की मांग पुरजोर तरीके से उठाते रहे हैं लेकिन कांग्रेस सरकार ने अपना चुनावी वादा नहीं निभाया।

राजस्थान में दलित अत्याचार

अब एक नज़र डालते हैं राजस्थान में दलित उत्पीड़न की वारदातों पर… राजस्थान पिछले कुछ सालों से दलित अत्याचार का हब बनता जा रहा है। दलितों के साथ मारपीट, हत्याएं और दलित महिलाओं से बलात्कार के भयानक मामले सामने आ रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2019 में 65, 2020 में 84 और 2021 में 85 दलितों की निर्मम हत्याएं हुई है। साल 2022 के प्रारम्भिक महीनों में दलितों पर अत्याचार और हत्याओं के काफी मामले सामने आ चुके हैं।

हत्याओं पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि साल 2019 से 2021 के तीन वर्षों में हत्या के मामलों में 30.77 प्रतिशत की बढोतरी हुई है। पिछले 3 सालों में 234 दलितों को मार डाला गया है, हर चौथे दिन एक दलित की हत्या हुई है।

इसी तरह दलित महिलाओं पर अत्याचार के मामलों का हाल है…2019 में 554 मामले दर्ज हुए, सन 2020 में 476 मामले रजिस्टर किये गये और साल 2021 में 566 मामले दर्ज हुए। 2021 तक आते आते 18.91 प्रतिशत मामले बढ़ गये हैं। पिछले 3 सालों में 1596 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएँ हुई है। यानी राजस्थान में हर 2 दिन में 3 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार की वारदात हो रही है।

दलित समुदाय पर अत्याचार के सभी मामले देखें तो 2019 में 6794 मामले दर्ज हुए थे, 2020 में ये बढ़कर 7017 हो गये और 2021 में 7524 मामले पंजीकृत हुए, अगर इन आंकड़़ों की साल के हिसाब से बढ़ोतरी पर नजर डालें तो यह घटने के बजाय बढ़ते जा रहे हैं। 2019 की तुलना में 730 मामले बढ़ गये हैं,ले किन चालान, एफआर और सजा का प्रतिशत देखने पर साफ हो जाता है कि राज्य की पुलिस दलित एट्रोसिटी के मामलों में कितनी संवेदनशील है। एससी-एसटी एक्ट में दर्ज़ मामलों में सज़ा मिलने की दर 10 % से भी कम है। यानी अशोक गहलोत सरकार ना ही राजस्थान में दलितों की रक्षा कर पा रही है और ना ही उन्हें न्याय दिला पा रही है।

एसीबी के प्राइम टारगेट पर है दलित जनप्रतिनिधि, कर्मचारी- अधिकारी

ये रिपोर्ट कहती है कि राज्य के एंटी करप्शन डिपार्टमेंट की ओर से अनुसूचित जाति के वार्ड पंच से लेकर आईएएस तक, चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है। आरोप है कि पिछले 3 सालों में एसीबी निरंकुश तरीक़े से इस वर्ग के हर स्तर के व्यक्ति को भ्रष्टाचार के प्रकरणों में उलझा रही हैं, कई मामलों में तो प्लांटेंड सबूतों के आधार पर कार्यवाही कर ली जाती है, तुरंत गिरफ़्तारी कर ली जाती है, सेवाओं से निलम्बन और बर्खास्त तक करने की कार्यवाही कर ली जाती है। तब तक आरक्षित वर्ग के व्यक्ति का पूरा कैरियर बर्बाद हो जाता है। अनुसूचित जाति अधिकारी कर्मचारी एसोशिएशन में इस बारे में हाल ही में ज़ोरदार विरोध भी दर्ज करवाया है।

क्या निष्कर्ष निकला ?

इस रिपोर्ट को देखकर आप भी इस नतीजे पर पहुंच गए होंगे कि राजस्थान की कांग्रेस सरकार दलितों के साथ बहुत अन्याय कर रही है। जिन दलितों ने राजस्थान में उनकी सरकार बनवाई, उन्हीं दलितों को कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार ने ठिकाने लगा दिया। गहलोत के राज में ना ही दलितों को उनकी आबादी के लिहाज से भागीदारी मिली ना ही दलितों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों पर रोक लग पाई। कांग्रेस को अब ये सोचना होगा कि वो इस तरह दलितों को कब तक मूर्ख बनाती रहेगी?

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