Home इंटरव्यू ग्राउंड रिपोर्ट : 115 दिन से धरने पर बैठी दलित प्रोफेसर डॉ...

ग्राउंड रिपोर्ट : 115 दिन से धरने पर बैठी दलित प्रोफेसर डॉ ऋतु सिंह के धरने पर एक सर्द रात…

हमारी टीम ने पूरी रात डॉ ऋतु सिंह के साथ गुज़ारने का फैसला लिया, हमने धरना स्थल पर पूरी रात बिताई और इसे अपने कैमरे में कैद किया।

774
0
blank
डॉ ऋतु सिंह के साथ The News Beak की टीम।

देश की राजधानी दिल्ली और एक महिला या सच कहूं कि एक दलित महिला जाड़े की ठिठुरती रात में एक दलित महिला प्रोफेसर क्यों सड़क पर रात गुज़ारती है ? जिस महिला प्रोफेसर को अपनी क्लास में छात्रों के बीच होना चाहिए था, वो क्यों सड़क पर है? दिल्ली में एक दलित महिला के संघर्ष की कहानी जानने के लिए द न्यूज़बीक की टीम दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैंपस पहुंची। हम रात करीब 8 बजे आर्ट्स फैकल्टी के गेट नंबर 4 पहुंचे, यहीं पर डॉ ऋतु सिंह पिछले 115 दिन से धरने पर बैठी हैं।

दिन भर यहां लोगों का आना-जाना लगा रहता है लेकिन हाड़ कंपा देने वाली ठंडी रात में यहां कितने लोग बचते हैं?  कैसे रात गुज़ारी जाती है? कैसे रात में डॉ ऋतु सिंह सोती हैं? सिक्योरिटी का ख्याल कौन रखता है? अगर रात में जातिवादियों का हमला हो जाए तो कौन बचाएगा? इन्हीं सब सवालों का जवाब तलाशने के लिए हमारी टीम ने पूरी रात डॉ ऋतु सिंह के साथ गुज़ारने का फैसला लिया। आगे हम आपको पूरी रात का हाल बताएंगे, हम आपको बताएंगे कि कैसे एक दलित महिला न्याय के लिए चौबिसों घंटे डटी हुई है? 

दिन भर रहती है भीड़, रात में कैसा माहौल ?

रात साढ़े 8 बजे हमने अपनी रिपोर्टिंग शुरू की। डॉ ऋतु का समर्थन करने के लिए दिन में सैकड़ों लोग पहुंचते हैं…लेकिन रात होते-होते कुछ ही लोग यहां रह जाते हैं। रात में जो साथी यहां रुकते हैं, वो दरी बिछाकर, कंबल ओढ़कर किसी तरह ठंड से बचने की कोशिश करते हैं। यहीं पर हमें आशुतोष मिले जो रात में झाड़ू लेकर धरना स्थल की सफाई कर रहे थे… दिल्ली यूनिवर्सिटी से लॉ की पढ़ाई कर रहे आशुतोष पहले दिन से डॉ ऋतु के समर्थन में यहां आ रहे हैं। 

इस बीच कुछ लोग डॉ ऋतु से मिलने के लिए आते रहे… जिन्हें घर जाना था, वो भी ऋतु को बाय बोलकर घर के लिए निकल रहे थे क्योंकि रात के 9 बज गए थे और ठंड भी पहले से बढ़ गई थी। हमने भी ठंड से बचने का इंतज़ाम किया और मफलर बांध लिया। रात में जो लोग यहां रुकते हैं, उनके लिए खाने-पीने का भी इंतज़ाम किया जाता है। कभी यहीं पर खाना बनाया जाता है तो कभी कोई समर्थक घर से ही खाना बनवा कर पहुंचा देता है। अब खाने का वक्त हो चला था और डॉ ऋतु के कहने पर हम भी उनके साथ ही खाने के लिए बैठ गए

जो लोग रात में रुके हैं, वही मिलकर सारा काम संभालते हैं… कोई खाना सर्व करता है तो कोई बाकी काम देखता है। आंदोलन के दौरान डॉ ऋतु सिंह अपने खाने-पीने का कैसे ख्याल रखती हैं? हमने ये सवाल भी उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि अक्सर उनकी तबीयत बिगड़ जाती है क्योंकि कई बार समय पर खाना नहीं खा पातीं। यहां जो इंतज़ाम हो पाता है, खा लिया जाता है। यहीं पर हमें अपेक्षा मिली जो दिल्ली यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट हैं और अपने पापा के कहने पर धरने में शामिल हुई हैं। हम सबने मिलकर साथ बैठकर खाना खाया और रात आगे बढ़ती रही।

दलित की बेटी, देश की बेटी नहीं

खाना खाने के बाद कुछ मीठा हो जाए… किसी ने यूं ही ये बात कही तो कोई समर्थक काजू कतली ले आया। आपको शायद ये लग सकता है कि यहां तो सब कुछ चंग्गा है। लोग चिकन खा रहे हैं, काजू कतली बांटी जा रही हैं लेकिन अभी ऐसा सोचने से पहले ज़रा रुक जाइये। क्योंकि अभी तो बस पौने दस बजे हैं। अभी पूरी रात बाकी है…

हमने ऋतु से ये भी जाना कि क्या उन्होंने बहुजन समाज के नेताओं को अपनी लड़ाई में शामिल होने के लिए बुलावा भेजा था? उन्होंने बताया कि कई नेताओं को बुलाया गया लेकिन बहुत कम नेताओं की ओर से कोई सकारात्मक जवाब मिला। वो कहती हैं कि शायद दलित की बेटी, देश की बेटी नहीं है।

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sumit Chauhan (@isumit_chauhan)

धरना स्थल के आसपास अलग-अलग संगठनों ने अपने-अपने पोस्टर लगा दिए हैं। मोर्चे वाली जगह को नीली रोशनी से सज़ाया गया है लेकिन उसके पीछे भी एक कहानी है। यहां तमाम प्रतिकों के पीछे आपको एक कहानी नज़र आएगी… यहीं पर बाबा साहब डॉ आंबेडकर की एक बड़ी सी तस्वीर लगी है जिसपर अलग-अलग रंगों की रोशनी बिखरती है तो वो दिल को भा जाती है। 26 नवंबर यानी संविधान दिवस को यहां इस तस्वीर को लगाया गया था। 

ये रोशनी शायद दलितों की ज़िंदगी में छाए अंधेरे को दूर करने में मददगार बने… ये रोशनी इस बात की ओर भी इशारा है कि भले ही अंधकार कितना ही गहरा क्यों ना हो…रोशनी की एक किरण उसे मिटाने के लिए काफी है।

रात में कई बार लोग परेशान करते हैं 

डॉ ऋतु बताती हैं कि कई बार ऐसा होता है कि वो रात में या तो बिलकुल अकेली रह जाती हैं या सिर्फ दो-तीन लोग ही यहां बचते हैं। कई बार ऐसा भी हुआ कि लोग उन्हें परेशान करने आ गए। यानी आंदोलन करने में भी जोखिम हैं लेकिन जब जोखिम ले ही लिया तो फिर डरना क्या… रात जैसे-जैसे बढ़ रही थी,  वैसे-वैसे ठंड भी बढ़ती जा रही थी। हमने भी ठंड को देखते हुए धरना स्थल पर मौजूद कंबल में का सहारा लिया….

कुछ लोग समय बिताने के लिए चेस खेल रहे थे ब्राह्मणवाद के खेल में भले ही बहुजनों को शह और मात के बीच पिसना पड़ता है लेकिन यहां खेल में बहुजन जीतते नज़र आए। इसी तरह से रात बीतती रही… फिर डॉ ऋतु और उनके साथियों ने बल्ली सिंह चीमा की पंक्तियां गुनगुनाई तो हम भी उनके साथ हो लिए। इसी तरह जय भीम के नारों के बीच रात आगे बढ़ती रही।

आधी रात हुई तो ठंड भी बढ़ गई

आधी रात हो चली थी और ठंड भी अब पहले से बढ़ चुकी थी। इसी बीच कुछ साथियों ने गर्मा गर्म चाय का इंतज़ाम कर दिया। हमने चाय पर चर्चा की ओर ठंड से बचने के इंतज़ाम करने लगे। चाय खत्म होने के बाद हम सब आपस में बातें करते रहे।  कई लोग जो यहां आए हैं वो भी किसी ना किसी तरीके से जातिवाद का शिकार हुए हैं इसलिए कुछ लोग अपने किस्से सुनाने लगे। इसी तरह रात कटती रही।

करीब 4 महीने से जारी है धरना

डॉ ऋतु सिंह का धरना करीब 4 महीने से जारी है लेकिन अभी तक ना ही दिल्ली यूनिवर्सिटी ने और ना ही पुलिस ने आरोपी प्रिंसिपल सविता रॉय पर कोई कार्रवाई की है। आरोपी प्रिंसिपल सविता रॉय के खिलाफ SC-ST एक्ट की गंभीर धाराओं समेत कई आपराधिक धाराओं में केस दर्ज़ हो चुका है, साथ ही डीयू के रजिस्ट्रार भी इस मामले में आरोपी हैं लेकिन अभी तक आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। दिल्ली पुलिस पर इस मामले में गंभीर लापरवाही करने के आरोप हैं। ऋतु का आरोप है कि सत्ताधारी बीजेपी के दबाव में पुलिस आरोपियों पर कोई एक्शन नहीं लेती जबकि उन्हें तारीख पर तारीख मिलती रहती है। 

ऋतु ने यहां उस लेटर का फ्लैक्स बोर्ड भी लगाया है जो उनके समर्थन में दौलतराम कॉलेज की ही चेयरपर्सन ने लिखा है। इसमें चेयरपर्सन ने सरकार को आरोपी प्रिंसिपल की शिकायत की है और उनपर गंभीर आरोप लगाए हैं। ऋतु हमें अपनी आपबीतीत सुनाती रही औऱ रात के करीब ढाई बज गए। 

टॉयलेट की सुविधा तक नहीं 

हमने ऋतु से ये भी जाना कहीं उन्हें टॉयलेट वगैरह के लिए कहां जाना पड़ता है? एक दलित महिला आंदोलनकारी को नेचरकॉल के लिए भी कैसे जूझना पड़ता है। वो हमें बताती हैं कि गेट के पास ही एक टॉयलेट है लेकिन जैसे ही धरना शुरू हुआ, उसका पानी बंद कर दिया गया ताकि हम इस्तेमाल ना कर सकें। अब टॉयलेट के लिए सेंट्रल लाइब्रेरी जाना पड़ता है। वापसी में ऋतु डीयू की महिला गार्ड्स के पास कुछ देर रुकी और उनके हीटर पर अपने हाथ सेंकने लगी।

ये देखकर मुझे मुंशी प्रेमचंद की कहानी पूस की रात की याद आ गई… जैसे मानों हलकू अलाव के पास बैठकर सर्दी को ललकार रहा हो कि तेरे जो जी में आए कर। अगर आप अपनी रजाई में दुबक कर ये देख या पढ़ रहे हैं तो हो सकता है कि आपको उस ठिठुरन का एहसास ना जो रात के करीब 3 बजे खुले आसमान के नीचे होती है। सर्द रात में पूस की रात के हलकू की तरह डॉ ऋतु भी ठंड से बचने के उपाय करती नज़र आईं।

धरना एक दिन और सरक गया

धरना एक दिन और आगे सरक गया था इसलिए रात में ही ऋतु ने अपने संघर्ष के दिनों से 115 का पांच मिटाया और उसे 6 यानी 116 कर दिया। हो सकता है किसी के लिए ये महज़ एक नंबर हो लेकिन उस महिला के बारे में सोचिए जो बीते 116 दिन से रोज इस बोर्ड पर नंबर लिखती और मिटाती है… इसी इंतज़ार में उसे न्याय मिलेगा। ठंड के आगे हौसलों की गर्माहट है इसीलिए शायद ऋतु इतने दिन से डटी भी हुई हैं। 

धीरे-धीरे रात सुबह में तब्दील होने को थी… सुबह के करीब 4 बज चुके थे। यहां मौजूद कुछ साथी रात में भी कलम की ताकत हासिल करने के लिए पढ़ाई कर रहे थे। इसी बीच डॉ ऋतु भी अपने टैंट में चली गईं, उन्होंने हमें बताया कि वो इसी तरह से अपनी रात गुज़ारती हैं

टैंंट में कंबल ओढ़कर भी वो करवटें बदलती रहीं। उस उक्ताहट और झुंझलाहट को फील करने की कोशिश कीजिए जो 115 दिन से धरने पर बैठे किसी आंदोलनकारी के सीने में होती है  इसी कशमकश में ऋतु कब सो गईं… ये शायद ना उन्हें पता चला और ना हमें। सवाल बिना जवाब ही रह गया कि आखिर न्याय कब मिलेगा?

  telegram-follow   joinwhatsapp     YouTube-Subscribe

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here