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तमिलनाडु के 30 % स्कूलों में जातिवाद, द्रविड़ मॉडल पर उठे सवाल !

15 स्कूलों में दलित छात्रों से टॉयलेट साफ कराए जा रहे हैं। 33 स्कूलों में तो दलित छात्रों को कलाई पर धागे बांधने पड़ते हैं ताकि दूर से ही उनकी जाति के बारे में पता लगाया जा सके। 19 स्कूलों में पानी पीने के लिए अलग-अलग गिलास रखे गए हैं।

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तमिलनाडु में हमेशा से ही ओबीसी जातियों की सरकार रही है और तमिलनाडु के सामाजिक न्याय मॉडल की हमेशा तारीफ भी की जाती है लेकिन ये सोशल जस्टिस मॉडल भी जाति की बीमारी का इलाज करने में पूरी तरह से कामयाब नहीं हो सका है। तमिलनाडु में जातिवाद पर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक तमिलनाडु के करीब 30 % स्कूलों में अभी भी दलित छात्रों के साथ किसी ना किसी तरह का जातिवाद होता है। 

टॉयलेट साफ कराने से लेकर कलाई पर जातीय धागे तक

तमिलनाडु अस्पृश्यता उन्मूलन मोर्चा की ओेर से किए गए रिसर्च में ये चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक इन स्कूलों में दलित छात्रों से टॉयलेट साफ कराने जैसे अपराध से लेकर जातीय भेदभाव, मिड-डे मील परोसते वक्त अलग लाइन में बैठाना, खेलने और लैब में प्रैक्टिस के लिए समय देने में भेदभाव जैसे अपराध खुलेआम होते हैं। कुछ स्कूलों में तो ये भी सामने आया कि दलित छात्रों को अपनी पहचान के लिए कलाई में किसी तरह का धागा या गले में चेन वगैरह भी पहननी पड़ती है ताकि उन्हें दूर से ही देखकर हिंदू जातियां समझ जाएं कि वो दलित हैं। 

छात्रों स्वीकारा, टीचर और सहपाठी करते हैं जातिवाद 

तमिलनाडु के तिरुनेलवेली में 12वीं के दलित छात्र पर उसके क्लासमेट्स द्वारा किए गए जातिवादी हमले के बाद ये सर्वे किया गया था। इसमें 36 ज़िलों के 441 स्कूलों में 641 दलित छात्रों से पूछा गया कि क्या उन्हें अपने स्कूल में किसी भी तरह का जातिवाद झेलना पड़ता है। 441 छात्रों में से 156 छात्रों ने ये स्वीकारा कि हाँ उनके स्कूल में उनके साथ टीचर और सहपाठी जातिभेद करते हैं।

रामनाथपुरम, कड्डोलर, थिरुवन्नामलाई, तनकाशी, डिंडिगुल जैसे 25 ज़िलों में छात्रों के बीच जातीय झड़प के मामले सामने आए हैं। 15 स्कूलों में दलित छात्रों की बाक़ायदा ड्यूटी लगाई गई है कि स्कूल के टॉयलेट साफ़ करें। अब ज़रा सोचिए उस बच्चे के दिलो दिमाग़ पर इसका कैसा असर होता होगा? कैसे उसकी ही क्लास के छात्र उसे हीन भावना से देखते होंगे? मुमकिन है कि इन सबसे परेशान होकर अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दे और उसका भविष्य हमेशा के लिए ख़राब हो जाए। आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कैसे दलित छात्रों का भविष्य ख़राब करने की हर मुमकिन साज़िश की जाती है। 

छात्रों को जातीय पहचान वाले धागे बांधना ज़रूरी 

यूँ तो हमारे देश में 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होते ही आर्टिकल 17 के तहत छुआ-छूत को क़ानूनी तौर पर ख़त्म कर दिया गया था लेकिन ऊँच-नीच की ये भावना आज भी बदस्तूर जारी है। इस रिपोर्ट में ये भी खुलासा हुआ है कि 33 स्कूलों में तो बाक़ायदा दलित छात्रों को अपनी जातीय पहचान दिखाने वाले धागे कलाई पर बांधने पड़ते हैं या उन्हें गले में कोई चेन जैसी कोई चीज़ पहननी पड़ती है ताकि दूर से ही उनकी जाति के बारे में पता लगाया जा सके। 21वीं शताब्दी में जब हम कहते हैं कि हमारा देश विश्वगुरु बनने की ओर बढ़ रहा है, तब इसी देश में दलित छात्रों के साथ ऐसा सलूक किया जा रहा है। पेशवाई में दलितों के गले में हांडी और कमर पर झाड़ू बांधा जाता था लेकिन अभी भी कई रूपों में ये भेदभाव हो रहा है। 

19 स्कूलों में पानी के लिए अलग बर्तन

इस रिपोर्ट के मुताबिक 19 स्कूल ऐसे हैं जहां दलितों और गैर-दलित छात्रों के लिए पानी पीने के लिए अलग-अलग गिलास रखे गए हैं। यानी जैसे बाबा साहब डॉ आंबेडकर को एक शताब्दी पहले स्कूल में भेदभाव सहना पड़ता था, आज एक सदी बीत जाने के बाद भी कुछ नहीं बदला। 

तमिलनाडु छुआ-छूत मिटाओ मोर्चे के लोगों का कहना है कि शहरों के मुक़ाबले गांव के स्कूलों में ज़्यादा जातिवाद होता है। मोर्चे ने अपनी ये रिपोर्ट जस्टिस चंद्रू कमेटी के सामने पेश की है, ये वही कमेटी है जो शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव के मामलों पर एक रिपोर्ट बना रही है। ये रिपोर्ट तमिलनाडु सरकार के सामने जाएगी।

तमिलनाडु सरकार ने क्या कहा ?

फ़िलहाल वहाँ के शिक्षा विभाग ने कहा है कि हम इसे गंभीरता से ले रहे हैं और इस साल समानता की थीम पर स्कूलों में आर्ट फ़ेस्टिवल आयोजित करवा रहे हैं। ऐसे फेस्टिवल्स से अगर जातिवाद दूर होना होता तो कब का हो चुका होता।

अगर समझाने, पढ़ाने और सिखाने से भी हिंदू जातियां दलितों के साथ जातिवाद करना बंद नहीं करती तो जरूरत है कि उनपर कानून का सख्त डंडा चले। ऐसे छात्रों को स्कूल से निकाल देना चाहिए जो स्कूल में जातिवाद करते हैं और ऐसे टीचरों को तुरंत नौकरी से बर्खास्त कर SC-ST एक्ट के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल देना चाहिए जो दलित छात्रों से टॉयलेट साफ करवाते हैं, उनके साथ जातिगत भेदभाव करते हैं और उन्हें कलाई पर जातीय धागे बांधने के लिए मजबूर करते हैं। ऐसे लोग समाज के लिए हानिकारक होते हैं और उन्हें खुले में नहीं छोड़ना चाहिए। ऐसे लोगों का सही ठिकाना सिर्फ और सिर्फ जेल है। 

स्टालिन सरकार पर भी उठे गंभीर सवाल

इस रिपोर्ट ने तमिलनाडु की स्टालिन सरकार पर भी गंभीर सवाल खड़ कर दिए हैं। द्रविड़ मॉडल के सहारे सामाजिक न्याय की जिस इमारत को खड़ा किया जा रहा है, क्या उसकी नींव में दलितों को यूं ही कुर्बान किया जाता रहेगा? तमिलनाडु सरकार को इसका जवाब भी ज़रूर देना चाहिए और सरकारी स्कूलों में जातिगत भेदभाव पर तुरंत एक्शन लेना चाहिए। इस बारे में आपकी क्या राय है?

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