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आधार और वोटर ID को लिंक करने से फर्ज़ी वोटिंग रुकेगी नहीं बल्कि और बढ़ जाएगी ?

ऐसा भी हो सकता है कि फ़र्ज़ी आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड बनवाकर उन्हें लिंक करा दिया जाए और फिर वोट डलवा दिये जाएं।

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पिछले हफ़्ते संसद में चुनाव क़ानून संसोधन बिल-2021 पास हुआ है। (Photo-Internet)

क्या आधार कार्ड को वोटर ID से लिंक करना सही है ? क्या इससे फर्ज़ी वोटिंग रुक जाएगी? क्या हैं आधार कार्ड और वोटर ID को लिंक के फायदे और क्या हैं इसके सबसे बड़े नुकसान? आगे इस लेख में हम इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे।

चुनाव क़ानून संसोधन बिल-2021 

पिछले हफ़्ते संसद में चुनाव क़ानून संसोधन बिल-2021 पास हुआ है। अब राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद इस कानून को लागू कर दिया जाएगा। मोदी सरकार ने इस क़ानून में आपके 12 अंकों के आधार कार्ड और वोटर ID को जोड़ने का प्रावधान किया है। यानी जिस तरह से आपने अपने पैन कार्ड, मोबाइल नंबर, राशन कार्ड और बैंक खाते से आधार को लिंक कराया है, उसी तरह अब आपको अपने वोटर ID कार्ड को भी आधार के साथ लिंक कराना होगा।

फर्ज़ी वोटिंग पर लगेगी लगाम – मोदी सरकार 

सरकार कह रही है कि इससे फर्ज़ी वोटिंग को रोकने में मदद मिलेगी। आधार कार्ड को वोटर ID से लिंक करने पर बायोमेट्रिक के जरिए मतदाता की पहचान करना आसान हो जाएगा और इससे फर्ज़ी वोटर चुनाव में वोट नहीं डाल पाएंगे। लेकिन क्या ऐसा सचमुच होगा? सुनने में तो मोदी सरकार का ये कदम काफ़ी दिलचस्प लगता है लेकिन असल में ये ख़तरनाक नतीजों वाला साबित हो सकता है। फ़र्ज़ी वोटिंग होती है फ़र्ज़ी मतदाता पहचान पत्र से… इसीलिए उसे आधार से जोड़ने की बात हो रही है लेकिन जब आधार कार्ड ही फर्ज़ी होगा तो बोगस वोटिंग घटेगी नहीं बल्कि बढ़ जाएगी।

करोड़ों फर्ज़ी आधार कार्ड कैसे बने ?

RTI में मिले जवाब बताते हैं कि 2014-15 में आठ करोड़ फर्जी आधार नंबरों का पता चला था। यानी उस समय तक देश में 8 करोड़ फर्ज़ी आधार कार्ड बनाए जा चुके थे। RTI में ये भी जानकारी मिली थी कि आधार कार्ड के डाटा में हेराफेरी की पूरी गुंजाइश है।

हनुमान का भी बन चुका है आधार कार्ड 

हमारे देश में पवन पुत्र हनुमान तक का आधार कार्ड बनाया जा चुका है और वो भी बाक़ायदा फ़ोटो के साथ। इतना ही नहीं शेरू सिंह के पुत्र टॉमी सिंह के नाम से एक कुत्ते तक का आधार कार्ड बनाया जा चुका है। इस तरह से करोड़ों फ़र्ज़ी आधार कार्ड हमारे देश में मौजूद हैं और रोज़ाना फ़र्ज़ी आधार कार्ड बन भी रहे हैं। इसलिए जो आधार कार्ड ख़ुद ही सिक्योरिटी के मामले में फिसड्डी है, वो वोटर के पुख़्ता होने की गारंटी कैसे दे सकता है?

फर्ज़ी आधार होल्डर्स को भी मिलेगा मताधिकार ?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि आधार कार्ड को वोटर ID से जोड़ने से फर्ज़ीवाड़ा घटेगा नहीं बल्कि बढ़ेगा। क्योंकि इससे करोड़ों फर्ज़ी आधार कार्ड होल्डर्स को भी वोट देने का मौका मिल जाएगा। जिस तरह से फर्ज़ी आधार कार्ड बनते हैं, वैसे ही फर्ज़ी वोटर कार्ड भी बनते हैं। इसलिए कोई भी रिश्वत देकर आधार के साथ-साथ वोटर ID कार्ड बनवा सकता है और आसानी से वोट देने के अधिकार को हासिल कर सकता है। आधार कार्ड भारत में रहने वाले शरणार्थियों को भी जारी किए गए हैं। इसलिए एक्सपर्ट्स को ये भी डर है कि चुनाव में ऐसे शरणार्थियों के फ़र्ज़ी पहचान-पत्र बनवाकर कोई पार्टी या नेता उनसे अपने पक्ष में वोटिंग करवा सकता है।

आधार-वोटर ID लिंकिंग प्रोसेस में गलती

अगर सरकार की बात मान भी लें कि इससे फ़ायदा होगा, तब भी आधार और वोटर ID को जोड़ने वाली लिंकिंग प्रोसेस में गलतियों की भरमार होगी और लाखों-करोड़ों लोगों से वोटिंग राइट्स छीन सकते हैं। मैं ये बातें हवा-हवाई नहीं कर रहा, क्योंकि अभी तक का अनुभव तो यही बताता है।

2015 में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में नेशनल इलेक्टोरल रोल प्यूरिफिकेशन एंड ऑथेंटिकेशन प्रोग्राम नाम से एक पायलट प्रॉजेक्ट चलाया गया था, जिसमें आधार नंबरों को वोटर आईडीज से लिंक किया गया था 2018 में जब इन दोनों राज्यों की मतदाता सूचियां प्रकाशित हुईं तो उनमें बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम गायब थे तेलंगाना में करीब 30 लाख और आंध्र प्रदेश में 21 लाख से ज्यादा लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कट चुके थे।

तेलंगाना में विधानसभा चुनावों से पहले हंगामा मच गया. हजारों लोगों को उसी दिन पता चला कि मतदाता सूची में उनका नाम है ही नहीं वह भी बिना किसी पूर्व सूचना के। RTI दस्तावेजों से पता चलता है कि जब आधार को वोटर आईडी से जोड़ा गया था, तब इस प्रक्रिया के लिए कोई डोरटूडोर वेरिफिकेशन नहीं किया गया था, बस एक डीडुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया था।

यानी हो सकता है कि जब आप वोट डालने जाएँगे तो वहाँ लिस्ट में आपका नाम ही ना मिले। यानी एक झटके में लाखों-करोड़ों लोगों का मताधिकार छिन सकता है क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि डोर-टू-डोर वैरिफिकेशन होगा।

ज़रूरी सेवाओं को आधार से जोड़ने में भयंकर ग़लतियाँ हुईं।

27 मार्च 2018 को, आधार कार्यक्रम को चलाने वाले भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट में माना था कि सरकारी सेवाओं के लिए आधार ऑथेंटिकेशन 12 फ़ीसदी तक नाकामयाब रहता है। उदाहरण के तौर पर झारखंड में एक अध्ययन में पाया गया कि 2016 से 2018 के बीच आधार से जोड़ने के दौरानफर्जीमानकर रद्द किए गए 90 फीसदी राशन कार्ड सही थे

यानी सरकार राशन कार्ड, मनरेगा पहचान पत्र वग़ैरह तक को सही ढंग से लिंक नहीं कर पाई और इससे लाखों लोग अपने अधिकारों से वंचित रह गए। ऐसे में अगर वोटर ID को आधार कार्ड से जोड़ने की प्रक्रिया सही ढंग से नहीं हुई तो आबादी के बड़े हिस्से को अपने मताधिकार से वंचित होना पड़ सकता है।  2019 में आधार डेटा में सेल्फरिपोर्टेट एरर चुनावी डेटाबेस की ग़लतियों की तुलना में डेढ़ गुना अधिक थीं

यानी फ़र्ज़ी आधार कार्ड फ़र्ज़ी वोटर से भी ज़्यादा हैं। ऐसे में फर्ज़ीवाड़े को कैसे रोका जाएगा?जब बाढ़ ही टूट चुकी होगी तो भला फसल को आवारा पशुओं से कौन बचाएगा?

चुनाव में फर्ज़ीवाड़ा कर सकती हैं पार्टियाँ

अब तक आप समझ चुके होंगे कि आधार कार्ड ख़ुद ही सुरक्षित नहीं है। ऐसे में फर्ज़ीवाड़े की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है और हो सकता है कि कुर्सी हथियाने के लिए सरकारें या पार्टियाँ ही हेराफेरी में लग जाएं। एक्सपर्ट्स को ये डर भी सता रहा है कि हो सकता है कि किसी क्षेत्र में विरोधी वोटर्स को जानबूझकर मतदाता सूची से बाहर करा दिया जाए। ऐसा भी हो सकता है कि फ़र्ज़ी आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड बनवाकर उन्हें लिंक करा दिया जाए और फिर वोट डलवा दिये जाएं।

आधार डाटा का ग़लत इस्तेमाल हो सकता है

आधार डाटा में आपकी सारी जानकारी होती है। आजकल ईमेल और मोबाइल नंबर भी आधार के साथ रजिस्टर हैं। इसी रजिस्टर नंबर या ईमेल से आप सोशल मीडिया भी चलाते हैं और वहाँ अपनी पसंद के नेता और पार्टी के बारे में लिखते-पढ़ते हैं, सर्च करते हैं…तो ऐसे में सोशल मीडिया कंपनियाँ सरकार से साथ गठजोड़ करके आपको एक ख़ास नेता या पार्टी से जुड़ी सामग्री दिखा सकती हैं और आपके वोट को प्रभावित कर सकती हैं।

2019 में कैम्ब्रिज़-एनालिटिका केस में ये साबित हो चुका है कि फ़ेसबुक ने एक ख़ास पार्टी के प्रति लोगों को प्रभावित करने के लिए उनकी निजी जानकारी का इस्तेमाल किया और उन्हें उसी पार्टी का कंटेंट ज़्यादा दिखाया। वोटर की प्रोफालिंग करके उन्हें प्रभावित किया जा सकता है। भारत में भी ये साबित हो चुका है कि कैसे फ़ेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल मीडिया कंपनियों ने जानबूझकर नफ़रत फैलाने वाले बीजेपी नेताओं के अकाउंट पर कोई कार्रवाई नहीं की

इसलिए ख़तरा बढ़ा है। बीजेपी पर 2021 के पुद्दुचेरी विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के आधार से जानकारी चुराने की जाँच हो रही है। आरोप है कि बीजेपी ने आधार में दर्ज जानकारी चुराकर लोगों के वोट प्रभावित करने की कोशिश की। ऐसे में इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा।

और ज़्यादा झंझट बढ़ जाएगा

बायोमेट्रिक डाटा में भी गड़बड़ी मुमकिन है। जैसे बहुत बार उन लोगों के फ़िंगरप्रिंट मैच नहीं करते जो हाथों से बहुत मेहनत का काम करते हैं। पत्थर तोड़ने वाले या खुदाई करने वाले मज़दूरों के फ़िंगरप्रिंट एक जैसे नहीं रह सकते है ऐसे में उनके वोटिंग राइट्स के छिनने का ख़तरा बढ़ जाएगा। आधार और वोटर ID कार्ड को जोड़ने से सरकारी झंझट भी बढ़ जाएगा क्योंकि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संस्था है और आधार कार्ड भी एक अलग संस्था है।

कोई गड़बड़ी हुई तो चुनाव आयोग कह देगा आधार दफ्तर और जाओ और आधार वाले कह देंगे चुनाव आयोग के पास जाओ… इससे खासकर गरीब आवाम को काफी मुश्किल हो सकती है। क्योंकि अक्सर हमारे अलग-अलग सरकारी कार्ड्स जैसे वोटर आईडी, पैन कार्ड और आधार कार्ड में हमारे नाम की स्पेलिंग या लास्ट नेम वगैरह अलग हो सकते हैं। कई बार इसमें हमारी कोई गलती नहीं होती लेकिन फिर भी हमें करेक्शन कराने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

यानी कुल मिलाकर नुक़सान ज़्यादा हैं और फ़ायदे कमलेकिन फिर भी मोदी है तो मुमकिन है। उम्मीद है आज के इस विश्लेषण से आपको इस पूरे मामले पर राय बनाने में आसानी हुई होगी। वीडियो देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें। 

 

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