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‘सीनियर चमार कहकर परेशान करता था’, जब आकाश आनंद को स्कूल में सहना पड़ा जातिवाद !

समाचार एजेंसी ANI को दिए इंटरव्यू में आकाश आनंद ने बताया कि जब वो नोएडा के पाथवेज़ स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे तो उनका एक सीनियर उन्हें चमार कहकर परेशान किया करता था।

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(Photo- @AnandAkash_BSP)

बहुजन समाज पार्टी के नेशनल कोऑर्डिनेटर और बहनजी के उत्तराधिकारी आकाश आनंद ने एक इंटरव्यू में बताया है कि उन्हें भी जातिवाद का सामना करना पड़ा था। समाचार एजेंसी ANI को दिए इंटरव्यू में आकाश आनंद ने बताया कि जब वो नोएडा के पाथवेज़ स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे तो उनका एक सीनियर उन्हें चमार कहकर परेशान किया करता था। आकाश आनंद से ANI की संपादक स्मिता प्रकाश ने पूछा था कि ‘कांशीराम जी और मायावती जी को तो अपने जीवन में जातिवाद का सामना करना पड़ा लेकिन आपको तो कई तरह के आराम और सुविधा मिली हैं तो आप बहुजन आंदोलन को कैसे देखते हैं?’

इस सवाल के जवाब में में आकाश आनंद ने कहा, जाति के आधार पर भेदभाव आज भी होता है। ऐसा नहीं है कि अब जातिवाद नहीं होता। अगर आप देश के अंदरूनी इलाकों में जाओगे तो आपको खुलेआम जातिवाद होता दिखाई देगा। अगर आप मेट्रो सिटीज़ में आएंगे, टियर 1, टियर-2 शहरों में आएंगे तो आपको एक खास ढंग से जातिवाद होता दिखाई देगा। बहुजन समाज पार्टी ने यही हासिल किया है कि लोगों ने अपने लिए खड़े होकर लड़ना शुरू किया। एक वक्त था जब बीएसपी नहीं थी तो हमारे समाज का आदमी बड़ी जाति के आदमी के सामने भी नहीं बैठ सकता था। एक कुएं से पानी तक नहीं पी सकता था। हमें गांव के एक हिस्से के तौर पर भी स्वीकारा नहीं जाता था। हमारे घर गांव के बाहर बस्ती में ऐसे बसाए जाते हैं कि उधर से हवा नहीं चलती है, हवा दूसरी तरफ से चलती है और हमारी बस्ती से होते हुए बाहर निकल जाती है। तो लोग उस लेवल पर डिस्क्रिमिनेट करते थे। लेकिन आज ऐसा वक्त है कि कोई भी बहुजन समाज को हल्के में नहीं ले सकता। वो चीज़ जो बहुजन समाज पार्टी कर पाई है, वो हमारे लिए एक उपलब्धि है। आज हमारे पास एक प्लेटफॉर्म है जहां हम अपने मुद्दों को उठा सकते हैं। 

इस जवाब के बाद स्मिता प्रकाश ने फिर से अपना सवाल दोहराया कि कांशीराम जी को खुद जातिवाद का सामना करना पड़ा था इसलिए मूवमेंट उनके व्यक्तिगत अनुभव से निकला था। मायावती जी ने भी खुद जातिवाद सहा, राजनीति में उनके लिए कठिन समय था। लेकिन आपने जातिवाद नहीं सहा, इसलिए आपकी आवाज़ उनके जैसी किस तरह से है? 

इस सवाल के जवाब में आकाश आनंद ने अपने खुद के साथ हुए जातिवाद के एक किस्से को साझा करते हुए कहा, ‘मैं आपको एक पर्सनल केस बताता हूं। मैं पाथवेज़ वर्ल्ड स्कूल में था जो कि देश के सबसे प्रीमियम स्कूलों में से एक है। मेरा एक सीनियर था जो मुझ से एक साल सीनियर था। शायद मैं छठी क्लास में था और वो सातवीं क्लास में था। ये बहुत ही पर्सनल है, मैंने कभी भी इसके बारे में किसी को नहीं बताया है। मैंने स्कूल ज्वाइन ही किया था, मैं स्कूल में नया था… हर किसी को पता था कि मैं बहनजी का भतीजा हूं। ये लड़का भी पॉलिटिकल बैकग्राउंड से था, बहनजी जैसे बड़े नेता के कद का नहीं लेकिन MLA लेवल के नेता का… उसमें मुझे चमार कहने का दुस्साहस किया था। उसने ये गलती से नहीं कहा था बल्कि वो जानबूझकर मुझे डेढ़-दो साल तक चमार कहकर परेशान करता रहा, जब तक कि मुझमें हिम्मत नहीं आ गई कि मैं उसका सामना करूं। उसे पता था कि चमार कहना एक इंसल्ट है, वो मुझे बेइज्जत करने के लिए मुझे चमार बोलता था। वो मुझे ऐसे चमार बुलाता था जैसे ये कोई गाली हो। यहां तक वो मुझे सबके सामने, मेरे दोस्तों के सामने भी चमार बुलाता था… उसे आसपास देखकर मुझे बेहद शर्मिंदगी महसूस होती थी। इसलिए ऐसा नहीं है कि किसी ने जातिवाद नहीं सहा है, ऐसी कई और घटनाए हैं।’

आकाश आनंद का ये व्यक्तिगत अनुभव बताता है कि कैसे बड़े-बड़े दलित नेताओं और कामयाब दलितों के बच्चों और बड़े-बड़े स्कूल-कॉलेजों में पढ़ने वाले एलिट दलितों के साथ उनकी जाति के आधार पर भेदभाव होता है।

आकाश आनंद के इस जवाब के बाद स्मिता प्रकाश ने पूछा कि क्या उस छोटी उम्र में जब आपको चमार बुलाया जा रहा था, तो क्या आपको चमार का मतलब पता था?  इस सवाल के जवाब में आकाश आनंद ने कहा, हां… साफ तौर पर। हम ये जानते थे कि चमार और दलित का क्या मतलब होता है। किसी को भंगी, चमार या हरिजन यूं ही नहीं कहा जाता बल्कि उन्हें अपमानित करने के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। हम इन सबके बारे में जानते थे। 

स्मिता प्रकाश ने अगला सवाल पूछा – क्या आपको बताया जाता था कि ये हमारी कास्ट है? इस पर गर्व करो। अगर कोई उसे (जाति) को स्लर (गाली) की तरह कहते हैं तो तुम्हें उसका जवाब देना चाहिए। आपको ये किसने सिखाया? आपकी मां ने? पिता ने या बुआ ने? 

इस सवाल के जवाब में आकाश आनंद ने कहा, ‘ये हम सब देखते थे। मेरे पिता 2003 तक एक सरकारी नौकरी में थे, हमारे घर के सामने एक अपर कास्ट के… हम तो उन्हें अंकल ही बोलते थे क्योंकि हमारे घर में कभी किसी को जात से नहीं बताया गया कि ये अपर कास्ट से है, ये लोअर कास्ट से है। ऐसे नहीं बोलते थे। वो बस बोलते थे कि ये शर्मा जी हैं… ये पांडेय जी हैं। ये गुप्ता जी हैं, ये गौतम जी हैं। ऐसे करके बोलते थे। ये चीज़ें थोड़ा देर से एहसास हुई, जैसे हम ज़िंदगी में आगे बढ़े। जो हमारे घर के सामने रहे थे अंकल, उन्होंने भी बहुत बार ऐसे काम किए हैं…वो मोहल्ले में जैसे बदतमीज़ी हो जाती है और सब लोग देखते हैं, तो मेरे पिता और माता के साथ ऐसी घटनाएं भी हुईं। हमारे सामने हुईं, तो वो चीज़ धीरे-धीरे समझ आने लगी कि ये शब्द जो इस्तेमाल कर रहे हैं, वो गलत है। ये नोएडा की बात है। शहरों में भी जातिवाद होता है। वहां से समझ में आया कि ये गलत चीज़ है, ऐसे नहीं बोलते हैं। फिर धीरे-धीरे बुआ जी के साथ जब हम शिफ्ट हुए तो हमें इस तरह की घटनाओं के बारे में बहुत सी जानकारियां मिलना शुरू हुई, तब हमें पता चला कि ये सही है और ये गलत है।’

आकाश आनंद ने अपने और अपने परिवार के साथ हुए जातिवाद के वाकयों के बारे में तफ्शील से बताया… उनके स्कूल की घटना पर जब स्मिता ने पूछा कि क्या आपने स्कूल के टीचर या प्रिंसिपल से इस बारे में शिकायत की थी? तो आकाश आनंद ने कहा, ‘नहीं… यही तो पहली समस्या है। जब इस तरह की घटनाएं होती हैं तो हम सबको लगता है कि इग्नोर कर देते हैं, चुप हो जाते हैं, बोलकर क्या फायदा। एक तो उम्र में बड़ा है मुझसे… ज्यादा ताकतवर है। उसके पास ज्यादा दोस्त हैं। वो मारेगा…वो मारपीट कर सकता है। ऐसी चीज़ों में क्यों पड़ना? चुपचाप पीछे हट जाओ। तब किसी से बात करने की मुझमें हिम्मत नहीं थी, शायद मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलती यही थी। और शायद वहीं पर मैंने सीखा कि अगर आपको अपने हकों के लिए लड़ना है या किसी को भेदभाव करने से रोकना है तो आपको लड़ना ही होगा।

ये समझने में मुझे थोड़ा वक्त लगा क्योंकि मैं उस वक्त बहुत छोटा था। डेढ़ साल के बाद मैं उसके पास गया और बोला कि अगर तुम ऐसा करते रहे तो बड़ी मुसीबत हो जाएगी। उस समय तक मैं ये समझ चुका था कि राजनीतिक ताकत कुछ होती है ना सिर्फ स्कूल और सोसाइटी के बाहर बल्कि स्कूल के भीतर और मेरे दोस्तों के आसपास भी… तब मेरे पास उसे धमकाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था इसलिए मैंने उसे कहा कि अगर तुम ऐसा करते रहे तो मैं तुम्हें स्कूल के बाहर घसीटकर ले जाऊंगा और तुम्हें बताऊंगा कि चमार होना क्या होता है। और मुझे ये लगा कि मैं ऐसा कर सकता हूं क्योंकि मुझे लगा था कि मेरे पास वो पॉलिटिकल बैकअप है और मुझे लगता है कि वही ताकत हम आज बनाने की कोशिश कर रहे हैं। मैंने इस घटना के बारे में अपने मां-बाप या बहनजी…किसी से जिक्र नहीं किया है। वो सब भी अपनी-अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं इसलिए इससे मुझे खुद ही निपटना था। मैं खुद इन चुनौतियों से निपटना चाहता था और मैं निपटा भी।’ 

आकाश आनंद ने पहली बार मीडिया के सामने अपनी ज़िंदगी में हुई जातिवाद की घटनाओं के बारे में खुलकर बोला है। आकाश आनंद का केस हमें ये समझाने के लिए काफी है कि दलित बैकग्राउंड का व्यक्ति चाहे जितना भी कामयाब हो जाए, समाज में लोग उसको उसकी जाति की नज़र से ही देखते हैं। जो लोग ये कहते हैं कि अमीर हो जाने के बाद जात-पात खत्म हो जाती है वो इस घटना से अंदाजा लगाए कि देश के सबसे नामचीन स्कूल में जब एक मुख्यमंत्री के भतीजे को सब सहना पड़ रहा था तो फिर गांव-देहात के स्कूलों में दलित बच्चों को क्या कुछ नहीं सहना पड़ता होगा?

बाबा साहब डॉ आंबेडकर को भी क्लास रूम के बाहर बैठकर पढ़ना पड़ा था और आज भी हमारे कितने ही होनहार बच्चे जातिवाद का शिकार हो रहे हैं। ऐसे वक्त में हमें अपने बच्चों को जाति की समस्या के बारे में जागरूक करना चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि अगर कोई उनके स्कूल-कॉलेज में उन्हें जाति के नाम पर परेशान करता है तो वो तुरंत उसकी शिकायत करें या अपने घर वालों को आकर उसके बारे में बताएँ क्योंकि कई बार ऐसी घटनाएं बच्चे की मेंटल हेल्थ पर बहुत बुरा असर डालती हैं। आकाश आनंद उस समय छठी क्लास में थे इसलिए वो वक्त निश्चित तौर पर उनके लिए भी बेहद डरावना और परेशान करने वाला रहा होगा लेकिन उन्होंने हिम्मत जुटाई और उसका सामना किया। ऐसे ही हमें भी अपने बच्चों को हिम्मत देनी चाहिए। आकाश आनंद के इस खुलासे पर आपका क्या कहना है? कमेंट करके ज़रूर बताएं। आपसे अपील है कि वीडियो को शेयर करें और द न्यूज़बीक को सब्सक्राइब करना ना भूलें। वीडियो के अंत में आपसे एक छोटी सी अपील। 

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