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Modi Made Disaster : वैज्ञानिकों ने पहले ही बताया था ‘तबाही आ रही है’, लेकिन किसी ने नहीं सुनी !

एक्सपर्ट पैनल ने मार्च महीने में ही मोदी सरकार को कोरोना से हालात बिगड़ने के बारे में बताया था लेकिन चुनाव जीतने में जुटी मोदी सरकार ने इस चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया।

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‘मोदी मेड डिज़ास्टर’…  हमारे देश में इन दिनों जो रहा है उसे ‘मोदी मेड डिज़ास्टर’ ही कहना चाहिए। क्योंकि इतने बुरे हालातों के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ पीएम मोदी ही ज़िम्मेदार हैं। कोरोना से जितनी तबाही हो रही है, उसके लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ मोदी सरकार ही ज़िम्मेदार है। मैं ये बातें हवा में नहीं कह रहा, इस बात के पक्के सबूत सामने आए हैं कि कैसे पीएम मोदी ने देश को कोरोना की इस आग में झोंक दिया।

एक्सपर्ट की चेतावनी को मोदी सरकार ने नज़रअंदाज़ किया 

एक्सपर्ट पैनल ने मार्च महीने में ही मोदी सरकार को कोरोना से हालात बिगड़ने के बारे में बताया था लेकिन चुनाव जीतने में जुटी मोदी सरकार ने इस चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि मोदी सरकार ने समय रहते मिली चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया। सरकार की इस लापरवाही ने आज पूरे देश को शमशान बना दिया है। 

आपको पूरी ख़बर समझाते हैं

दरअसल 25 दिसंबर 2020 को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने INSACOG यानी The Indian SARS-CoV-2 Consortium on Genomic नाम से देश की 10 राष्ट्रीय लेबोरेट्रीज़ के वैज्ञानिकों का एक ग्रुप बनाया था। इसका काम सिर्फ और सिर्फ भारत में कोरोना वायरस के ऊपर रिसर्च करना था। रॉयटर्स में प्रकाशित खबर के मुताबिक INSACOG ने मार्च महीने की शुरूआत में ही कोरोना वायरस के नए वैरिेएंट के बारे में चेतावनी जारी की थी। वैज्ञानिकों के इस पैनल में शामिल एक वैज्ञानिक ने नाम छिपाने की शर्त पर रॉयटर्स को बताया कि पैनल ने उस बड़े अफसर को इस बारे में आगाह किया था जो सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रिपोर्ट करता है। यानी पीएम मोदी के बहुत ही ख़ास आदमी को कोरोना के बारे में पहले ही पता चल चुका था।

क्या पीएम को रिपोर्ट करने वाले अफसर ने उन्हें नहीं बताया ?

क्या ऐसा मुमकिन है कि इतनी गंभीर चेतावनी के बाद भी उस अफ़सर ने पीएम मोदी को ये बात बताई ही नहीं हो? या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि अफ़सर के बताए जाने के बाद भी पीएम मोदी ने चुनावी रैलियों के चक्कर में इसपर कोई ध्यान ही नहीं दिया हो। हालाँकि PMO ने अभी तक इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी है। लेकिन इस बात की गुंजाइश कम ही लगती है कि कोई बड़ा अफसर देश पर आने वाले इतने बड़े खतरे के बारे में पता होते हुए भी प्रधानमंत्री को ना बताए। ऐसे में गलती कहां से हुई? देश को इस सवाल का जवाब मिलना ही चाहिए। 

10 मार्च को जारी की थी चेतावनी

रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफ़ साइंस के डायरेक्टर और INSACOG के सदस्य अजय परिदा के मुताबिक INSACOG ने फरवरी की शुरुआत में ही कोरोना वायरस के B.1.617 को डिटेक्ट किया था और 10 मार्च को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को भी रिपोर्ट भेजी गई। स्वास्थ्य मंत्रालय को आगाह किया गया कि ये नया वैरिएंट देश में तेज़ी से बढ़ सकता है और बड़ी तबाही ला सकता है। लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी इस चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया। 

वैज्ञानिकों के इस पैनल INSACOG ने अपनी रिसर्च पर एक विस्तृत प्रेस रिलीज भी भेजी जिसमें साफ-साफ लिखा गया कि E484Q और L452R नाम के म्यूटेशन ‘High Concern’ यानी बेहद चिंता का विषय है। शोध से पता चलता है कि कोरोना वायरस के इन दोनों म्यूटेशन से संक्रमण का ज्यादा खतरा है और ये शरीर के इम्यून सिस्टम को भी बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। 

कैबिनेट सेक्रेटरी राजीव गाबा को पता था

यानी वैज्ञानिकों ने ये बता दिया था कि कोरोना वायरस का इंडियन वैरिएंट बहुत ज़्यादा ख़तरनाक है। INSACOG ने स्वास्थ्य मंत्रालय के साथसाथ ये मीडिया रिपोर्ट देश के सबसे बड़े अफसर कैबिनेट सेक्रेटरी राजीव गाबा को भी भेजी थी जो सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करते हैं। अब पता नहीं राजीव गाबा ने पीएम को नहीं बताया या फिर पीएम ने देश को नहीं बताया कि ये वायरस अब कितना बड़ा खतरा लाने वाला है। 

स्वास्थ्य मंत्रालय ने ‘High Concern’ शब्द को हटा लिया

INSACOG की ओर से भेजी गई प्रेस रिलीज़ के आधार पर स्वास्थ्य मंत्रालय ने दो हफ्ते बाद 24 मार्च को एक प्रेस रिलीज़ जारी कर दी। लेकिन इस प्रेस रिलीज़ में ‘High Concern’ शब्द को हटा लिया गया। मंत्रालय ने सिर्फ इतना कहा कि कोरोना वायरस का नया वैरिएंट घातक है और उससे बचने के लिए टेस्टिंग और क्वारंटीन जैसी सुविधाएं बढ़ाई जाएं। यानी कहीं ना कहीं कैबिनेट सेक्रेटरी राजीव गाबा, पीएम मोदी और स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन की ओर से इतनी गंभीर चेतावनी पर कोई ध्यान ही नहीं दिया गया। 

नीतियां बनाना सरकार का काम है – शाहिद जमील 

INSACOG के सदस्य शाहिद जमील ने इस बारे में बताया ‘हम चिंतित थे और सरकार इस पर ज्यादा ध्यान हीं दे रही थी। नीतियां सिर्फ विज्ञान के आधार ही बनाई जानी चाहिएं। मैं चिंतित हूं कि नीतियां बनाने में विज्ञान को आधार नहीं बनाया गया लेकिन मैं ये भी जानता हूं कि मेरी हद क्या है। बतौर वैज्ञानिक हम सबूत पेश करते हैं लेकिन नीतियां बनाना तो सरकार का काम है।’

यानी एक संभावित ख़तरे के बारे में पता होते हुए भी मोदी सरकार ने भीड़भाड़ रोकने की कोई कोशिश नहीं की। पूरे मार्च महीने में ख़ुद पीएम मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा बंगाल समेत पाँच राज्यों में चुनावी रैलियाँ और रोड शो कर रहे थे। विपक्षी नेताओं ने भी अपनी रैली में खूब भीड़ जुटाई। सरकार ने इस दौरान कुंभ मेले के आयोजन की भी इजाज़त दे दी जिसमें देश भर से लाखों साधूँ-संत जुटे और फिर उन्होंने वापस लौटकर देश के अलग-अलग हिस्सों में वायरस को फैलाने में बड़ी भूमिका निभाई। दिल्ली के अलग-अलग बॉर्डर्स पर आज भी हज़ारों-लाखों किसान धरना दे रहे हैं लेकिन मोदी सरकार ने किसानों की माँग मानकर धरना ख़त्म कराने की जगह उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया। ऐसे कोई इंतज़ाम नहीं किए जिससे भीड़भाड़ को कम किया जा सके ताकि वायरस ना फैले। 

वैज्ञानिकों ने अप्रैल के पहले हफ्ते में लॉकडाउन लगाने की नसीहत दी

INSACOG दिल्ली स्थित National Centre for Disease Control को रिपोर्ट करता है। इस National Centre for Disease Control के डायरेक्टर हैं सुजीत कुमार सिंह, रॉयटर्स ने एक वीडियो क्लिप के हवाले से बताया है कि 19 अप्रैल को हुई मीटिंग में सुजीत कुमार सिंह ने कहा था कि कम से कम 15 दिन पहले ही सख्त लॉकडाउन लगा देना चाहिए था। 18 अप्रैल को हुई मीटिंग में भी उन्होंने कहा था ‘इस पर साफ-साफ ज़ोर दिया गया है कि अगर अभी तुरंत कुछ बेहद सख्त कदम नहीं उठाये गए तो आने वाले दिनों में होने वाली मौतों को रोकने में बहुत देर हो जाएगी’

सुजित सिंह ने बताया कि मीटिंग में शामिल कुछ सरकारी अफ़सर इस बारे में भी चिंतित थे कि हालात बिगड़ने पर छोटे शहरों में ऑक्सीजन जैसी ज़रूरी चीजों की क़िल्लत हो सकती है। 

पीएम के कोरोना सलाहकार वी. के पॉल को भी सब पता था

यानी अप्रैल के पहले हफ्ते में ही देश में लॉकडाउन की सख्त ज़रूरत थी लेकिन जब चुनाव देश की अवाम से ज़्यादा ज़रूरी हो जाए तो भला अवाम की किसे पड़ी है। सरकार ने चेतावनी मिलने के हफ़्ते भर बाद National Task Force for COVID-19 नाम से 21 एक्सपर्ट्स की एक टीम बनाई जिसका काम कोरोना पर स्वास्थ्य मंत्रालय को तकनीकी और वैज्ञानिक तरीकों से मदद करना है। National Task Force for COVID-19 के अध्यक्ष पीएम मोदी के कोरोना सलाहाकार वी. के पॉल हैं। National Task Force for COVID-19 ग्रुप के लोगों ने 15 अप्रैल को एक बैठक की और उसमें कहा कि हालात बहुत ज्यादा खराब हैं और हमें लॉकडाउन की सख्त ज़रूरत है।

रॉयटर्स ने एक वैज्ञानिक के हवाले से बताया है कि वी.के पॉल उस मीटिंग में मौजूद थे। यानी पीएम मोदी के कोरोना सलाहकार को 15 अप्रैल को इस बात का पता था कि देश बड़ी आपदा की और बढ़ रहा है। तो क्या उन्होंने इस बारे में पीएम मोदी को नहीं बताया होगा? अगर नहीं तो ऐसे सलाहकारों को जेल में क्यों नहीं डाल देना चाहिए जो अपना काम तक सही से नहीं कर सकते। 

National Centre for Disease Control के डायरेक्टर हैं सुजीत कुमार सिंह ने भी 18 अप्रैल को लॉकडाउन की सलाह दी लेकिन दो दिन बाद जब पीएम मोदी ने देश को संबोधित किया तो कह दिया कि लॉकडाउन सिर्फ आखिरी विकल्प है।

भारत में रोज़ाना आ रहे करीब 4 लाख केस

कोविड इंडिया.org पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 1 मई को भारत में 3,92, 459 नए मामले सामने आए। पूरी दुनिया में एक दिन में इतने मामले कभी नहीं आए, ये एक रिकॉर्ड नंबर है। भारत में आज सुबह तक कोरोना वायरस से 2,15,523 लोगों की मौत हो चुकी है।

कोरोना का नया वेरिएंट तो है ही जानलेवा लेकिन हमारी सरकार की नाकामी और बदइंतज़ामी भी इन लोगों की मौतों का सबसे बड़ा कारण हैं। पिछले एक साल में क्यों कोई पुख़्ता इंतज़ाम नहीं किया गया? जब पूरी दुनिया कोरोना से निपटने के लिए नए अस्पताल और ऑक्सीजन प्लांट लगा रही थी तब भारत के प्रधानमंत्री राम मंदिर का शिलान्यास कर रहे थे। अब मुश्किल वक़्त में ना अस्पताल हैं, ना बेड हैं, ना वेंटिलेटर्स हैं और ना ही लोगों के पास ऑक्सीजन है। आलम ये है कि 40 साल बाद भारत को दुनिया के सामने मदद के लिए हाथ फैलाने पड़ रहे हैं। जो 40 सालों में कभी नहीं हुआ वो पीएम मोदी ने कर दिखाया।

एक साल में भी पुख्ता इंतज़ाम नहीं 

देश के हर ज़िले में अपना फ़ाइव स्टार ऑफिस बना लेने वाली बीजेपी क्यों देश के हर ज़िले में एक अच्छा कोविड अस्पताल नहीं बना पाई। क्यों नरेंद्र मोदी देश में ऑक्सीजन प्लांट नहीं लगवा पाए। मोदी सरकार ने बीते एक साल में 150 ऑक्सीजन प्लांट लगाने का टेंडर जारी किया लेकिन उसमें से सिर्फ़ 33 ऑक्सीजन प्लांट ही लग पाए। जबकि एक दिन में 24 सिलेंडर ऑक्सीजन पैदा करने वाले प्लांट की लागत महज़ 33 लाख है और उसे महज़ हफ़्ते-दो हफ़्ते में चालू किया जा सकता है। लेकिन नए ऑक्सीजन प्लांट लगाने की जगह मोदी सरकार देश की ऑक्सीजन को दूसरे देशों में बेचती रही।

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की ओर से साझा की गई जानकारी के मुताबिक़ भारत ने 2019-20 में 4502 मीट्रिक टन ऑक्सीजन बाहर भेजी जबकि साल 2020-21 में 9300 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का निर्यात किया गया। यानी कोरोना काल में जब लोग तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहे थे तब मोदी सरकार ने दोगुना ऑक्सीजन विदेश भेजा। और आज हमें ऑक्सीजन के महज़ चंद सिलेंडर्स के लिए चीन, पाकिस्तान, सऊदी अरब और बांग्लादेश जैसे मुल्कों के सामने हाथ फैलाना पड़ रहा है। 

क्या अब भी आप कहेंगे कि ये प्राकृतिक आपदा है? क्या अब भी आप कहेंगे कि पीएम मोदी ने देश को कोरोना से बचाने के लिए पुख़्ता इंतज़ाम किए? और क्या अब भी आप वाह मोदी जी वाह… कहते हुए ताली-थाली और घंटा बजाएँगे। अंधभक्त बजा सकते हैं लेकिन उन लाखों लोगों के परिवारों से जाकर पूछिए जिन्होंने इस मोदी मेड डिज़ास्टर में अपनों को खो दिया है। इसलिए ये कहने में मुझे कोई संकोच नहीं हो रहा है कि ये मोदी मेड डिज़ास्टर है।

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