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Movie Review : कैंपस के द्रोणाचार्यों के खिलाफ एकलव्य की दर्दभरी चीख है ‘कोटा- द रिज़र्वेशन’ फिल्म

डॉ रोहित वेमुला और डॉ पायल तड़वी जैसे लोंगो को समर्पित ये फिल्म उस भयानक हकीकत से आपको रूबरू कराती है जिसका शिकार होकर हमारे होनहार छात्र भीतर से टूटकर बिखर जाते हैं।

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Poster by Baba Play App

कोटा… द रिज़र्वेशन। ये एक फ़िल्म का नाम है जो अब रिलीज़ हो चुकी है। शूद्रा द राइज़िंग फिल्म के निर्माता-निर्देशक संजीव जयसवाल ने इस फ़िल्म को बनाया है इसलिए इस फ़िल्म की काफ़ी चर्चा हो रही है। नाम सुनकर आप अंदाज़ा लगा रहे होंगे कि ये फ़िल्म आरक्षण के सवाल के आसपास घूमती होगी। लेकिन असल में ये फ़िल्म सिर्फ़ आरक्षण पर आधारित नहीं बल्कि उससे आगे बढ़कर कुछ बुनियादी समस्याओं को उजागर करती है।

‘कोटा’ फ़िल्म की कहानी

फ़िल्म की कहानी की बात करें तो ये आरक्षण की वजह से मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाले उन छात्रों के संघर्ष पर आधारित है जो अपना सपना पूरा करना चाहते हैं लेकिन मेडिकल कॉलेज में उन्हें भयंकर जातिवाद का सामना करना पड़ता है। उनकी जाति की वजह से उन्हें अपमानित किया जाता है, जातिवादी गालियाँ मिलती है और हिंसा का भी शिकार होना पड़ता है। यहाँ तक कि कॉलेज प्रशासन, पुलिस और सत्ता… सब मिलकर इन दलित छात्रों को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

शिक्षण संस्थानों में जातिवाद का क्रूर चेहरा दिखाती है 

ये फ़िल्म शिक्षण संस्थानों में जातिवाद के क्रूर चेहरे और माँ सरस्वती के दिव्य प्रांगण माने जाने वाले कैंपस में ब्राह्मणवाद के नंगे नाच को परत द परत बेनक़ाब करती है। साथ ही ये फ़िल्म दलित छात्रों के आत्मसम्मान के लिए संघर्ष को भी पर्दे पर उकेरती है। फ़िल्म में दिखाया गया है कि उस समय क्या हुआ होगा जब हैदराबाद यूनिवर्सिटी के स्कॉलर डॉ रोहित वेमुला और मुंबई के टोपीवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज की छात्रा पायल तड़वी की सांस्थानिक हत्या को अंजाम दिया जाता है। फ़िल्म उन दर्दनाक लम्हों को स्क्रीन पर दिखाती है जब रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे छात्रों को बर्बाद करने के लिए पूरा का पूरा सिस्टम उन्हें चक्रव्यूह में फंसाता है। उनके डिप्रेशन में जाने से लेकर ख़ौफ़नाक कदम उठाने तक के दर्द भरे सफ़र को आप क़रीब से महसूस कर पाएँगे।

(Poster-Baba Play App)

एक सीन में मुख्य किरदार सौरभ रावत कहता है ‘किसी से भी पूछो लोग कॉलेज के दिनों को सबसे शानदार बताते हैं लेकिन कोई हम दलित छात्रों से पूछे, हम कॉलेज में एक-एक दिन को कैसे काटते हैं’… फ़िल्म एक ऐसी कहानी है जो दलित बैकग्राउंड से आने वाले बहुत से छात्रों को अपनी कहानी लगेगी।

फ़िल्म में कौन-कौन है ?

फ़िल्म में मुख्य किरदार का नाम सौरभ रावत है जिसे टीवी जगत के जाने-माने अभिनेता अनिरुद्ध दवे ने निभाया है। वहीं अभिनेत्री गरिमा कपूर ने ऋचा वाल्मिकी का रोल निभाया है। लखनऊ मेडिकल कॉलेज में जातिवादी छात्र पंकज शुक्ला की भूमिका राजीव दिनकर ने निभाई है तो वहीं एक्टिविस्ट राजशेखर की भूमिका में आदित्या ओम नीला गमछा डाले नज़र आते हैं। कुल मिलाकर सभी किरदारों ने शानदार एक्टिंग की है।

ख़ासकर अनिरुद्ध दवे ने देहात से 12वीं पास करके बड़े मेडिकल कॉलेज में आए एक दलित छात्र की भूमिका को बहुत संजीदगी से निभाया है। अनिरुद्ध के चेहरे पर मासूमियत, दर्द, संघर्ष और सपनों के भाव बहुत अच्छे से उभरते हैं। राजशेखर के किरदार में आदित्य ओम को देखकर आपको भीम आर्मी चीफ़ चंद्रशेखर आज़ाद की याद ज़रूर आएगी।

ऋचा वाल्मीकि को देख आप डॉ पायल की उस हंसती हुई तस्वीर को याद किये बिना नहीं रह पाएँगे जो अब हमेशा के लिए बस एक याद बन चुकी है। फ़िल्म में वो सीन भी दिखाया गया है जब डॉ पायल तड़वी को कुछ सीनियर छात्राओं ने सिगरेट से दागा था और उसे जातिगत गालियाँ दी थी।

रोहित वेमुला और पायल तड़वी की फाइल फोटो।

ऋचा और सौरभ जब अपने परिवार के सपनों के बारे में बात करते हैं तो उनके चेहरे पर पीढ़ियों की उम्मीदें झलकती हैं, पहली पीढ़ी के ऋचा और सौरभ अपने परिवार के लिए डॉक्टर बनना चाहते हैं लेकिन जातिवाद उनके सपनों को कुचलने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ता। कुल मिलाकर सभी किरदारों ने काफ़ी अच्छी एक्टिंग की है।

निर्देशन और डायलॉग

फ़िल्म की कहानी और स्क्रीन प्ले लिखने के साथ-साथ निर्देशन का काम भी ख़ुद संजीव जयसवाल ने किया है। संजीव के निर्देशन का अंदाज़ा आपको शूद्रा द राइज़िंग देखकर हो जाता है तो और वो इस फ़िल्म में बेहतर निर्देशन करते हैं। सीन कसे हुए हैं और ज़रूरत के हिसाब से जाति, उत्पीड़न, आरक्षण से जुड़े सवाल और पीड़ा को बख़ूबी दिखाया गया है। कुल मिलाकर संजीव जयसवाल ने एक ऐसे मुद्दे को सिनेमा की गलियों में लाकर खड़ा कर दिया है जिसपर कोई फ़िल्म मेकर बात करना भी पसंद नहीं करता।

मुझे सबसे अच्छी बात ये लगी कि फ़िल्म में बिना किसी लाग-लपेट के नाम और सरनेम से सीधे जाति को स्थापित किया गया है। यानी यहाँ जाति को ढकने की कोशिश नहीं की गई है बल्कि उसे एक कड़वी सच्चाई के तौर पर सबके सामने रखा गया है। HOD के नेम बोर्ड से लेकर कॉलेज कैंपस में गणेश की भव्य प्रतिमा दिखाने तक संजीव ने उस ब्राह्मणवादी संस्कृति को दिखाने की कोशिश कि है जो हमारे शिक्षण संस्थानों में पसरी हुई है।

संजीव ने छोटी-छोटी चीजों को पकड़ा है, डायलॉग आम बोलचाल वाले हैं और सीधे समझ में आते हैं। एक सीन में जातिवादी सीनियर पंकज शुक्ला कहता है ‘मैं सौरभ शुक्ला, शुक्ला यानी ब्राह्मण और तू रावत यानी चमार’ वहीं एक सीन में ऋचा वाल्मिकी को सीधे वाल्मिकी जाति का नाम लेकर गाली दी जाती है, फिल्म में जाति की क्रूर चेहरे को आईना दिखाया गया है।

(लीड रोल में हैं अभिनेता अनिरुद्ध दवे)

फिल्मांकन कमाल का है और बारिश को एक एक्सप्रेशन के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। जब सौरभ को जातिवादी प्रोफेसर अरुण त्रिवेदी जान-बूझकर फेल कर देता है तो और सौरभ टूट जाता है तो बारिश की बूँदें ऐसी लगती हैं जैसे उसके आंसू आंखों की जगह आसमान से बरस रहे हैं।

फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे जानबूझकर फेल करने के बाद मेरिट की दुहाई देकर सौरभ के मनोबल को तोड़ने की साज़िश होती है। HOD अरुण त्रिवेदी जितने घटिया तरीके से सौरभ को नीचा दिखाने की कोशिश करता है, उसे सुनकर आपको गुस्सा आ जाएगा। डॉयलॉग बेहद दमदार और सटीक हैं जो जातिवादियों की घटिया मानसिकता को उजागर करते हैं।

बुद्ध और बाबा साहब के प्रतीक

फ़िल्म में बुद्ध और बाबा साहब डॉ आंबेडकर की तस्वीरों का खूब इस्तेमाल किया गया है। हॉस्टल के कमरे से लेकर पुलिस थाने तक… बाबा साहब की तस्वीर आपको नज़र आ जाएगी। हॉस्टल में सौरभ मन लगाकर पढ़ता है, किताबों के बीच बुद्ध अत्त दीपो भव का संदेश देते नज़र आते हैं लेकिन संजीव बुद्ध की बगल में शेरावाली की तस्वीर भी दिखाते हैं। एक्टिविस्ट राजशेखर के शेल्टर में भी बाबा साहब के साथ किसी देवता की तस्वीर नज़र आती है।

मुख्य किरदार जय भीम बोलने वाला है लेकिन भगवान के सामने भी हाथ जोड़ता हुआ दिखता है, गायत्री मंत्र पढ़ते हुए नज़र आता है। अब संजीव यहां दलितों के हिंदूकरण को दिखाना चाहते थे या फिर उनके आंबेडकरवादी बनने की यात्रा को… ये सीन देखकर साफ नहीं होता है। हो सकता है संजीव दलितों की उस मनोदशा को दिखाने की कोशिश कर रहे हों जिसमें दलित अपने घर के मंदिर में देवी-देवताओं के साथ बाबा साहब की तस्वीर रख देते हैं और उन्हें पूजने लगते हैं लेकिन मुझे लगता है इस फ़र्क़ को समझाने के लिए भी फ़िल्म में कुछ हिंट दिए जाने चाहिए थे। इस पर थोड़ा और काम किया जा सकता था।

फ़िल्म देखकर क्या सवाल उठता है ?

ये फ़िल्म दलित छात्रों से जुड़ी समस्याओं को बहुत संजीदगी से बयां करती है। शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव, मेरिट के नाम पर दलित छात्रों को परेशान करने वाले द्रोणाचार्य प्रोफ़ेसर, आरक्षण को लेकर सवर्ण छात्रों के दिमाग़ में भरे ज़हर को दिखाया गया है। एक सीन कुछ सवर्ण छात्र ये कहते हुए दिखाई देते हैं कि ‘मैं शक्ल देखकर बता सकता हूं कि ये कोटे वाले हैं’… ये सीख सवर्ण छात्रों को अपने घरों से ही मिलती है और वो अपनी हर नाकामी को आरक्षण के माथे मढ़ देते हैं।

फिल्म में दलित समाज से आने वाले अफ़सरों और नेताओं की निष्क्रियता को सफल ढंग से दर्शाया गया है। लेकिन फ़िल्म देखकर आपको लगेगा कि क्या दलित समाज इतना कमज़ोर है कि इतना सब-कुछ होने के बाद भी उसे ग़ुस्सा नहीं आ रहा, क्यों जातिवाद के ख़िलाफ़ एक मज़बूत प्रहार नहीं किया जाता? क्यों कोई विद्रोह नहीं कर रहा?

ये सवाल आपके दिमाग़ में ज़रूर आएगा लेकिन आपको ये सवाल पूछने से पहले ये समझना होगा कि ये फ़िल्म उन छात्रों की पीड़ा और संघर्ष को दिखाती है जो दूरदराज़ के इलाक़ों से किसी तरह बड़े कॉलेजों में पहुँचे हैं, वो पहली पीढ़ी के लोग हैं जिन्होंने यूनिवर्सिटी की दहलीज़ को लांघा है, ये वो बच्चे हैं जिनकी आँखों में सिर्फ़ अपने सपने नहीं बल्कि पूरे परिवार और समाज के सपनों को पूरा करने का भी बोझ है, ये वो छात्र हैं जो शायद बहुत आत्मविश्वासी नहीं हैं, ये वो छात्र है जिनके कॉन्फ़िडेंस को जातिवादी प्रोफ़ेसर बार-बार तोड़ने की कोशिश करते हैं, ये वो मासूम बच्चे हैं जो अभाव में रहते हैं।

ये वो छात्र हैं जिन्हें स्कूल के सिलेबस में कभी बाबा साहब डॉ आंबेडकर और राष्ट्रपिता जोतिबा फुले के संघर्ष को नहीं पढ़ाया गया। ये वो पीढ़ी है जिसे अपना इतिहास भी ठीक से मालूम नहीं है। ये ज़मीन में दबाए गए वो बीज हैं जो अब धरती से बाहर निकलकर एक छोटा सा पौधा बन रहे हैं, आगे चलकर इन्हें फलदार पेड़ बनना है लेकिन दुष्ट मनुवादी इन्हें जड़ से उखाड़ देना चाहते हैं, ऐसे में इन बच्चों से इतनी उम्मीद करना बेमानी है कि वो किसी क्रांतिकारी की तरह पेश आएँगे।

संजीव ने शायद यही दिखाने की कोशिश की है, वो चाहते तो किसी ऐसे छात्र के किरदार को डाल सकते थे जो जातिवादियों पर हिंसक हमला करने से भी पीछे नहीं रहता, लेकिन उन्होंने ऐसा करने में सावधानी बरती। फ़िल्म का ज़्यादा ज़ोर उस दर्द पर है जिससे ये छात्र गुज़रते हैं और यक़ीन मानिए फ़िल्म देखते हुए आपको वो दर्द ख़ुद महसूस होगा।

फिल्म से आपको क्या सीख मिलती है ?

इस फिल्म को देखकर हमें ये सीखना चाहिए कि किसी भी शिक्षण संस्थान में अगर जातिगत भेदभाव होता है, तो हमें एकजुट होकर उसका मुकाबला करना चाहिए। हमें अपने बच्चों को जातिवाद से लड़ने की ट्रेनिंग देने की भी जरूरत है, हमें अपने बच्चों को ये सिखाना चाहिए कि अगर उनके साथ जातिगत भेदभाव होता है तो उसमें उनकी कोई गलती नहीं है और उन्हें उससे घबराने की जरूरत नहीं है। हमें अपने बच्चों को मेंटली तैयार करना होगा कि जातिवादियों के हमलों से टूटना नहीं बल्कि दमदारी से उसका सामना करना है।

ये फिल्म हमें ये भी सिखाती है कि कैसे हमें अपने समाज के छात्रों की मेंटल हेल्थ पर भी ध्यान देना चाहिए, हमें अपने समाज के छात्रों के साथ बात करनी चाहिए और पता लगाने की कोशिश करनी चाहिए कि कहीं वो ऐसे दर्दनाक हालात से तो नहीं गुजर रहे। कॉलेज-यूनिवर्सिटी में ऐसे सपोर्ट ग्रुप बनाने चाहिए जो एक-दूसरे की मदद करें और जातिवाद का शिकार छात्रों को काउंसलिंग मुहैया करा सके। हमें अपनी पीढ़ियों को बचाने की बहुत जरूरत है, ये फिल्म इस ओर भी हमारा ध्यान दिलाने में सफल होती है।

फ़िल्म को कहां देख सकते हैं ?

संजीव की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक़ वो कोटा फ़िल्म को सिनेमा घरों में रिलीज़ करना चाहते थे ताकि दुनिया के सामने दलित छात्रों के दर्द को दिखाया जा सके लेकिन थिएटर मालिकों ने उन्हें स्क्रीन नहीं दी। मजबूरी में इस फिल्म को संजीव ने अपने खुद के OTT प्लेटफॉर्म BABA PLAY पर रिलीज़ कर दिया है। आप गूगल प्ले स्टोर या एप्पल ऐप स्टोर से बाबा प्ले नाम का ऐप डाउनलोड कर सकते हैं और वहां इस फिल्म को देख सकते हैं।

Baba Play App

संजीव ने एक जरूर मुद्दे को उठाया है जिसे सवर्ण फिल्म मेकर कभी नहीं उठाएंगे इसलिए इस फिल्म को कामयाब बनाना हम सबकी जिम्मेदारी है। आप बाबा प्ले ऐप डाउलोड कीजिए और फिल्म को देखकर अपनी राय हम तक जरूर पहुंचाए। ये रिव्यू आपको कैसा लगा, इस बारे में अपनी राय कमेंट के जरिए जरूर दें और हमारे यूट्यूब चैनल को भी Subscribe जरूर करें।

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