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चावदार तालाब क्रांति दिवस : ऐसे मिला था अछूतों को पानी पीने का अधिकार

क्या आप जानते हैं कि भारत में पानी पीने के हक़ का संघर्ष बहुत लंबा है? बाबा साहब ने तब कहा था ‘इस पानी को पीने से हम अमर नहीं हो जाएँगे लेकिन ये साबित करेगा कि हम भी इंसान हैं’

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बाबा साहब ने तब कहा था ‘इस पानी को पीने से हम अमर नहीं हो जाएँगे लेकिन ये साबित करेगा कि हम भी इंसान हैं’

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पिछले दिनों ग़ाज़ियाबाद में एक मुस्लिम लड़के को इसलिए बेरहमी से पीटा गया क्योंकि वो मंदिर में पानी पीने के लिए चला गया था। इसके बाद ये बहस शुरू हुई कि पानी पिलाना तो नेक काम है और सिर्फ़ इतनी सी बात के लिए किसी के साथ हैवानियत करना ठीक बात नहीं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में पानी पीने के हक़ का संघर्ष बहुत लंबा है? आइये जानते हैं पानी पीने के हक़ की ऐतिहासिक लड़ाई चावदार तालाब क्रांति के बारे में।

चावदार तालाब क्रांति दिवस (1927)

चावदार तालाब नाम का यह आंदोलन बाबा साहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर की अगुवाई में 20 मार्च 1927 को महाराष्ट्र राज्य के रायगढ़ ज़िले के महाड़ स्थान पर चलाया गया। यह आंदोलन अछूतों दलितों को सार्वजनिक तालाब से पानी पीने और इस्तेमाल करने का अधिकार दिलाने के लिए किया गया प्रभावी सत्याग्रह था। उस वक़्त हिंदुओं के धर्म स्थानों , कुओं और तालाब पर कुत्ता-बिल्ली, गाय-भैंस और गधे जैसे जानवर तो पानी पी सकते थे, नहा सकते थे लेकिन उसी तालाब से एक (अछूत) मनुष्य को पानी पीने की मनाही थी। चाहे वह प्यास से मर ही क्यों न रहा हो। यह भेदभाव की इंतहा थी। सोचा जा सकता है कि जो पानी पशुओं के पीने और इंसान के नहाने और धोने से अपवित्र नहीं होती , वह अछूत मनुष्य के छूने भर से अपवित्र हो जाता है। ऐसा तब हिंदुओं का मानना था। आज भी तमाम जगहों पर सार्वजनिक स्थलों से दलितों को पानी लेने की आज़ादी नहीं है।

पिछले दिनों ग़ाज़ियाबाद में एक मुस्लिम लड़के को इसलिए बेरहमी से पीटा गया क्योंकि वो मंदिर में पानी पीने के लिए चला गया था। (Art by Lokesh)

उस दौरान अछूतों को सार्वजनिक नदी, तालाब और सड़कें इस्तेमाल करने की मनाही थीं। डॉ. आम्बेडकर ने सार्वजनिक स्थलों से वंचित तबके को पानी पिलाने का हक़ दिलाने के लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ी। इसके बाद अगस्त 1923 को बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल के द्वारा एक प्रस्ताव लाकर यह कहा गया कि जिन स्थानों की देख-रेख सरकार करती है, उन सभी जगहों को इस्तेमाल करने का हक़ सभी को है। इस आदेश के बाद 1 जनवरी 1924 में, महाड़ जो की बाम्बें प्रेसीडेंसी का हिस्सा था, उस अधिनियम को नगर निगम परिषद के द्वारा लागू किया गया। बावजूद इसके सवर्ण हिंदू इस आदेश को मानने को तैयार नहीं थे। वो चावदार तालाब से दलितों के पानी लेने का विरोध कर रहे थे।

इसके ख़िलाफ़ 1927 में बाबा साहब ने एक सत्याग्रह करने का निर्णय लिया। बहिष्कृत हितकारिणी सभा के तहत 20 मार्च को एक सम्मेलन किया गया। इसमें शामिल होने के लिए दस हज़ार से ज़्यादा लोग पहुँचे। सभा की समाप्ति के बाद सम्मेलन के अंत में सभी ने चावदार तालाब की ओर मार्च किया। उस दौरान दलितों की भारी संख्या के कारण सवर्ण हिंदू चाह के भी किसी को रोक ना सकें। तालाब पर पहुँच कर सभी ने उसका पानी पीया और फिर वापस चले गए। उनके जाने के बाद तालाब अशुद्ध होने की बात कहकर ब्राह्मणों ने तालाब के पानी को शुद्ध किया। वंचित समाज के लोग इस मामले को लेकर कोर्ट चले गए और दिसंबर 1937 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने इंसानियत के पक्ष में फ़ैसला लिया और सभी को तालाब का पानी इस्तेमाल करने की इजाज़त दे दी। इसके बाद इस तालाब का इस्तेमाल सभी करने लगे और डॉ आंबेडकर की अगुवाई में चावदार तालाब आंदोलन सफल हुआ।

बाबा साहब ने तब कहा था ‘इस पानी को पीने से हम अमर नहीं हो जाएँगे लेकिन ये साबित करेगा कि हम भी इंसान हैं’

 

(Art by Lokesh)

भारतीय इतिहास में ये पहली बार था जब पीने के पानी को लेकर इतना बड़ा आंदोलन किया गया था। लोग गांधी के नमक सत्याग्रह को तो याद करते हैं लेकिन उससे भी पहले हुए महाड़ सत्याग्रह को भूल जाते हैं। लोगों ये समझना चाहिए कि कैसे डॉ आंबेडकर ने एक लंबे संघर्ष के बाद अपनी असंख्य संतानों को सार्वजनिक स्थानों से पानी पीने का हक़ दिलाया था।

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