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आर्यपुत्र, गाय का गोबर खाकर मूत पी सकता है लेकिन दलित कुक के हाथ का बना खाना क्यों नहीं खा सकता ?

सवर्ण अफसरों ने जातिवाद करने वाले छात्रों और उनके पेरेंट्स पर कोई कार्रवाई करने की जगह दलित कुक को ही नौकरी से निकाल दिया।

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गोबर खाकर मूत पीने वाले घटिया जातिवादी लोग एक दलित महिला के बनाए खाने को नहीं खा सकते क्योंकि वो ख़ुद को ऊंचा और उस दलित कुक को नीच मानते हैं। उत्तराखंड के राजकीय इंटर कॉलेज सूखीढांग में करीब 230 छात्रछत्राएं पढ़ाई कर रहे हैं। इनमें से कक्षा 6 से 8वीं तक के 66 बच्चे मिडडे मील के दायरे में आते हैं।

सवर्ण बच्चों ने नहीं खाया खाना

बीते सोमवार को सिर्फ अनुसूचित जाति के 16 बच्चों ने ही मिडडे मील खाया। चूंकि, भोजन पकाने वाली महिला दलित वर्ग से थी इसलिए सवर्ण छात्रों ने मिड डे मील खाने से इनकार कर दिया। सवर्ण छात्रों ने ये बात जब अपने घर वालों को बताई तो अभिभावकों ने भी कॉलेज में आकर खूब हंगामा किया। इन घटिया जातिवादी पेरेंट्स ने अपने 8-10 साल के बच्चों को ऐसे घटिया संस्कार दिए हैं। इन्होंने अपनी औलाद को इंसान और इंसान में भेद करना सिखाया है।

जातिवादी पेरेंट्स ने किया बवाल 

इसके अगले दिन इंटर कॉलेज मैनेजमेंट कमेटी और अभिभावकों की बैठक हुई लेकिन इस बैठक में भी छात्रों को समानता का पाठ पढ़ाने की जगह दलित भोजनमाता को ही नौकरी से निकालने दिया। सवर्ण मुख्य शिक्षा अधिकारी आरसी पुरोहित और सवर्ण बीईओ अंशुल बिष्ट ने दलित कुक की नियुक्ति को अवैध बताकर उसे नौकरी से हटा दिया।

अफसरों ने दलित महिला कुक को ही निकाला

अब दलित कुक की जगह एक ब्राह्मण महिला कुक को नौकरी दी गई है। ख़ुद को विश्वगुरु कहने वाले इस देश की हरामी व्यवस्था कितनी घटिया है, ये घटना इस बात का सबसे अव्वल उदाहरण है। जातिवाद करना भारत के संविधान के खिलाफ है। SC-ST एक्ट की धाराओं में किसी से जाति के आधार पर भेदभाव करना दंडनीय अपराध है लेकिन सवर्ण अफसरों ने जातिवाद करने वाले छात्रों और उनके पेरेंट्स पर कोई कार्रवाई करने की जगह दलित कुक को ही नौकरी से निकाल दिया।

दलित हिंदू नहीं, उनका छुआ भी नहीं खाते हिंदू 

शायद इसी तरह सनातन धर्म की रक्षा की जा सकती थी क्योंकि दलित को हिंदू हैं नहीं। अगर होते तो क्या सवर्णों को एक दलित कुक के हाथ का खाना से कोई परहेज़ होता? खैर, गोबर खाकर मूत पीने वाले घटिया जातिवादी लोगों से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है। जिनके दिमाग में ही गोबर भरा हो वो भला समानता का मतलब क्या समझेंगे। 

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