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आरक्षण खत्म करने पर सुप्रीम कोर्ट ने दिए गंभीर संकेत, सिर्फ EWS आरक्षण रखने की नसीहत

सुप्रीम कोर्ट के जजों की टिप्पणियों से एससी-एसटी और ओबीसी समाज को मिलने वाले संवैधानिक आरक्षण पर ख़तरा सा महसूस होने लगा है। अब तो एक जज साहब ने इशारों में जातिगत आरक्षण को ख़त्म करने की बात तक कह डाली है।

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All Reservations May Go And Only EWS May Remain; But That's A Matter Of Policy' : SC In Maratha Quota Case.

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देश की सबसे बड़ी अदालत जिसमें बहुजन समाज के जज ना बराबर है, उसी अदालत से बहुजनों के प्रतिनिधित्व यानी आरक्षण से जुड़े मसले पर पिछले कई दिनों से अहम टिप्पणियाँ आ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के जजों की टिप्पणियों से एससी-एसटी और ओबीसी समाज को मिलने वाले संवैधानिक आरक्षण पर ख़तरा सा महसूस होने लगा है। अब तो एक जज साहब ने इशारों में जातिगत आरक्षण को ख़त्म करने की बात तक कह डाली है।

सिर्फ EWS आरक्षण रखने की नसीहत

मराठा समाज को आरक्षण देने के लिए बनाए गए महाराष्ट्र SEBC एक्ट 2018 पर सुनवाई के 9वें दिन सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवैधानिक पीठ की ओर से इशारों ही इशारों में EWS को छोड़कर सभी तरह के आरक्षण को ख़त्म करने जैसे गंभीर टिप्पणी की गई है। जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस एस. अब्दुल नज़ीर, जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस एस. रविंद्र भट की बेंच ने कहा है कि इस बारे में फ़ैसला संसद को करना चाहिए। 

LIVE LAW की खबर के मुताबिक SCBC वेलफ़ेयर एसोसिएशन की ओर से एडवोकेट श्रीराम पी पिंगले ने कोर्ट में कहा ‘जाति कमरे में मौजूद हाथी की तरह है जिसपर ध्यान दिया जाना चाहिए। आरक्षण को बढ़ाने के लिए इंदिरा साहनी जजमेंट के आधार पर इसका राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है। चरण-बद्ध तरीक़े से जाति आधारित आरक्षण को ख़त्म करने का प्रयास होना चाहिए’

इस स्टेटमेंट के जवाब में जस्टिस अशोक भूषण ने कहा ‘ये संसद का काम है। जब संविधान को अपनाया गया तो एक जाति मुक्त समाज का उद्देश्य था। ये शुरूआत हो सकती है कि सभी तरह के आरक्षण ख़त्म हो सकते हैं और सिर्फ़ EWS आरक्षण रह सकता है। लेकिन ये सब नीतिगत है।’

सुप्रीम कोर्ट जो कहता है, उसका असर होता है। ऐसे में देश की सबसे बड़ी अदालत से आए इस बयान का बहुजन समाज पर गहरा असर हो सकता है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था कि आख़िर कितनी पीढ़ियों तक आरक्षण रहेगा जिसके बाद ये भी सवाल उठा कि आख़िर क्यों सुप्रीम कोर्ट ये नहीं पूछता कि आख़िर कितनी पीढ़ियों तक जातिवाद रहेगा?

सुप्रीम कोर्ट में सभी जाति-वर्गों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं ?

सवाल तो ये भी है कि सुप्रीम कोर्ट में क्यों सभी जाति और वर्गों के लोगों का समान प्रतिनिधित्व नहीं है? क्यों बिना किसी लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के कॉलेजियम सिस्टम के ज़रिए चुनिंदा जातियों के लोग ही सालों से जज बनते आ रहे हैं? क्या संविधान अपनाते वक़्त बाबा साहब और हमारे पुरखों ने जाति मुक्त समाज के साथ-साथ एक ऐसी शासन व्यवस्था का सपना नहीं देखा था जहां सबकी भागीदारी हो? जहां हर कोई इस देश को आगे ले जाने में अपनी भूमिका निभाए। जज साहब को ये सवाल भी ज़रूर उठाने चाहिए। 

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