Home विमर्श मुसलमानों में जाति : हकीकत को झुठलाना क्यों चाहता है मुस्लिम समाज?

मुसलमानों में जाति : हकीकत को झुठलाना क्यों चाहता है मुस्लिम समाज?

मो. अयान कहते हैं 'बहस तो इस बात पर है कि उसूलन ऊंच-नीच का भेदभाव नहीं होते हुए भी अमलन मुस्लिम समाज में ये क्यों मौजूद है?'

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www.theshudra.com (प्रतीकात्मक तस्वीर)

हिंदू समाज में वर्ण-व्यवस्था की मान्यता थी इसलिए जात पात या छुआछूत है यह बात समझ में आती है। मगर इस्लाम और उसकी किताब कुरान में जात-पात की मान्यता नहीं, वहां इसका होना और भी खतरनाक है, इस पर विचार विमर्श करने के बजाय बीमारी को छिपाने की प्रवृत्ति आज भी मुस्लिम समाज पर हावी है।

सवाल उठाने वालों को बताया जाता है दुश्मन

यही नहीं इन बीमारियों को निशानदेही करने वालों को इस्लाम का दुश्मन और मुसलमानों में फूट डालने वाला तक करार दिया जाता है। कुछ तो यहां तक कहते हैं की आर्थिक समृद्धि के साथ जाति का दर्जा भी ऊंचा उठता जाता है। इंसान की माली हालात में सुधार से उसका सामाजिक रुतबा बढ़ता है, इस बात से भला कौन इनकार कर सकता है। मगर जहां जन्म से जाति तय होती हो, वहां थोड़ा-बहुत माली हालत में बदलाव आने से जाति कहा बदल जाती है?

पसमांदा का बेटा-बेटी पसमांदा ही रहते हैं

कहते हैं जाति का निर्धारण कभी कर्म से होता था। लेकिन अभी तो ऐसा नहीं होता, अब तो जन्म के आधार पर ही जाति तय हो जाती है। जुलाहा-धुनिया और पसमांदा का बेटा-बेटी पसमांदा ही होते हैं, भले ही वह तरक्की कर कॉटन फैक्ट्री और पावर लूम ही क्यों न बैठा ले। उसी तरह सैयद का बेटा सैयद ही कहलाता है चाहे वह जूता ही क्यों न बनाता या बेचता हो।

हकीकत को झुठलाना चाहते हैं कुछ लोग

लेकिन फिर भी कुछ लोग इस जमीनी वास्तविकता को झुठलाने के लिए तरह तरह की दलीलें देते रहते हैं। कुछ लोग कहेंगे कि हिंदुओं की जातियों से ही चूंकि ज्यादातर लोग मुसलमान बने इसीलिए  वो अपने साथ इस बीमारी को ले आए। लेकिन इस तर्क में ज्यादा वज़न नहीं है क्योंकि जाति को सबसे ज्यादा तो वही मुसलमान मान रहे हैं जो कहते हैं कि हम अव्वल दर्ज़ा रखते हैं।

मुस्लिम समाज में ये क्यों मौजूद है?

जब कभी मुसलमानों के बीच जात-पात , ऊंच-नीच के भेदभाव के मुतल्लिक सवाल उठते हैं तो कुछ लोग कुरान की कुछ आयतों का हवाला देकर यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि इस्लाम में इस तरह का भेदभाव नहीं है। कुरान पर भला कहां बहस हैं? बहस तो इस बात पर है कि उसूलन ऊंच-नीच का भेदभाव नहीं होते हुए भी अमलन मुस्लिम समाज में ये क्यों मौजूद है? और अगर मौजूद है तो फिर भला अभी तक इस बीमारी का पुख्ता इलाज़ क्यों नहीं खोजा गया?

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Md Ayan

(ये लेख हमारे पाठक मो अयान का है। अयान पसमांदा समाज से आते हैं और बिहार में भीम आर्मी के कार्यकर्ता हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

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