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‘न्यायपालिका के ज़रिए कड़वे फ़ैसले लागू कराने की सरकार की आदत पुरानी है’

'किसान आंदोलन को निपटाने की कोशिश भी कोर्ट के ज़रिए हो रही है। लेकिन अब लगता है कि कोर्ट का इक़बाल ख़त्म हो गया है।'

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(Photo -https://main.sci.gov.in)

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न्यायपालिका के ज़रिए कड़वे फ़ैसले लागू कराने की सरकार की आदत पुरानी है।

1. SC-ST एक्ट सुप्रीम कोर्ट से ख़त्म करवाया गया था.

2. यूनिवर्सिटी में नियुक्तियों का रोस्टर बदलकर SC, ST, OBC का आरक्षण कोर्ट ने ख़त्म किया था।

3. प्रमोशन में आरक्षण पर रोक सुप्रीम कोर्ट से लगवाई गई।

4. असंवैधानिक सवर्ण आरक्षण का बचाव सुप्रीम कोर्ट के ज़रिए किया जा रहा है।

5. मराठा आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने रोक रखा है।

6. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के 27% OBC आरक्षण को कोर्ट के ज़रिए रोक कर रखा गया है।

कोर्ट से फ़ैसले कराने से सरकार को ये बहाना मिल जाता है किहम क्या करें? कोर्ट ने किया है। लेकिन सरकार ये नहीं बताती कि इन मामलों में सरकारी वकील ने कोर्ट में क्या कहा और किसका पक्ष लिया। वहीं सारी बेईमानी होती है।

मिसाल के तौर पर एससीएसटी एक्ट में केंद्र सरकार के वकील मनिंदर सिंह ने कोर्ट को लिखकर दिया था किसरकार की राय में इस एक्ट का दुरुपयोग होता है। रोस्टर मामले में भी सरकार ने आरक्षण के ख़िलाफ़ दलील दी थी।

किसान आंदोलन को निपटाने की कोशिश भी कोर्ट के ज़रिए हो रही है। लेकिन अब लगता है कि कोर्ट का इक़बाल ख़त्म हो गया है। अब उससे हो नहीं पा रहा है।

(प्रो दिलीप सी मंडल की फेसबुक वॉल से साभार। दिलीप मंडल वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और विचारक हैं। कई मीडिया संस्थानों में उच्च पदों पर रह चुके हैं और IIMC-माखन लाल यूनिवर्सिटी जैसे मीडिया संस्थानों में पढ़ा चुके हैं। हार्वर्ड यूूनिवर्सिटी में ‘कास्ट इन मीडिया’ विषय पर व्याख्यान दे चुके हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

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