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इंदिरा गांधी की घोषित इमरजेंसी और मोदी के अघोषित आपातकाल में कितना फर्क है ?

आज इंदिरा गांधी होती तो उन्हें अपनी गलती पर रोना आता, उन्हें इस बात का बहुत अफ़सोस होता कि उन्होंने अपने माथे पर इमरजेंसी का कलंक क्यों लगने दिया जबकि वो यही काम बिना इमरजेंसी लगाए भी कर सकती थीं।

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25 जून 1975 – देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दी थी। तमाम नागरिक अधिकारों को ख़त्म कर दिया गया, विपक्षी नेताओं और एक्टिविस्ट्स को जेल में डाल दिया। खूब दमन हुआ, इंदिरा के विरोधियों को देशद्रोही कहा गया लेकिन आज इंदिरा गांधी तो बहुत पछताती। आज इंदिरा गांधी होती तो उन्हें अपनी गलती पर रोना आता, उन्हें इस बात का बहुत अफ़सोस होता कि उन्होंने अपने माथे पर इमरजेंसी का कलंक क्यों लगने दिया जबकि वो यही काम बिना इमरजेंसी लगाए भी कर सकती थीं। आज इंदिरा गांधी अगर होती मोदी सरकार के अघोषित आपातकाल को देखकर कहती कि काश मैंने भी यही तरीक़ा अपनाया होता, काश मैंने भी बिना आपातकाल घोषित किए विरोध की हर आवाज़ को दबा दिया होता, काश मैंने भी बिना इमरजेंसी लगाए देश की न्यायपालिका से लेकर संसद तक को कठपुतली बना दिया होता।

इंदिरा गांधी होती तो आज ख़ुद भी काला दिवस मनाती क्योंकि उन्होंने पूरी दुनिया के सामने खुलेआम देश के संविधान को ताक पर रखकर ख़ुद को तानाशाह बनाने की कोशिश की थी लेकिन पीएम मोदी की तरह वो यही काम संविधान के सामने दंडवत प्रणाम करते हुए भी कर सकती थीं। अगर आत्मा होती है और इंदिरा की आत्मा कहीं से आज भारत को देख रही होगी तो उसे मोदी सरकार के अघोषित तानाशाही रवैये को देखकर बेचैनी होती होगी। आत्मा बुदबुदाती होगी कि क्यों मैंने आकाशवाणी पर आपातकाल की घोषणा की, काश मैं भी मोदी की दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को कुचल देती।

मैं ये बातें सिर्फ़ मोदी विरोध में नहीं कह रहा और ना ही मैं इसलिए कह रहा हूँ कि मैं इंदिरा गांधी के आपातकाल का समर्थक हूँ। बल्कि मैं तो ये बताने की कोशिश कर रहा रहूं कि 25 जून 2021 यानी आज के दिन 46 साल बाद आपातकाल को याद कर रहे हैं तो ये मत भूलिएगा कि मौजूदा दौर में भी अघोषित आपातकाल लगा हुआ है। बस फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि इंदिरा गांधी ने इसकी घोषणा की थी और मोदी सरकार बिना एलान किए अपने मक़सद को पूरा करने के लिए आगे बढ़ रही है।

क्या ये आपातकाल नहीं है कि मोदी सरकार के ख़िलाफ़ बोलने वाले हर शख्स को देशद्रोही करार दे दिया जाता है? क्या ये आपातकाल नहीं है कि मोदी की जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ बोलने पर लोगों की लिंचिंग हो जाती है? क्या छात्रों, विपक्षी नेताओं और एक्टिविस्ट्स को UAPA और NSA जैसे कानून लगाकर जेल में डाल देना इमरजेंसी नहीं माना जाएगा? क्या प्रो आनंद तेलतुंबड़े और प्रो हैनी बाबू जैसे आंबेडकरवादी बुद्धिजीवियों को जेल में डालना आपातकाल की श्रेणी में नहीं आता है? क्या दलित-मजदूर अधिकार कार्यकर्ता नौदीप कौर के साथ पुलिस हिरासत में यौन हिंसा इमरजेंसी की याद नहीं दिलाती है?

क्या CAA-NRC जैसे कानूनों के जरिए देश की अल्पसंख्यक आबादी की नागरिकता पर हमला आपातकाल का पक्का सबूत नहीं है? क्या दिल्ली दंगों में सीधे तौर पर शामिल कपिल मिश्रा जैसे संघी नेताओं पर कार्रवाई ना होना ये नहीं दिखाता कि इस देश में कानून सबके लिए बराबर नहीं है? ये तानाशाही नहीं है तो और क्या कि देश में करोड़ों लोग जब सांसों के लिए तरस रहे थे, मोदी सरकार ने लाशों के ढेर पर मोदी महल बनाने का काम शुरू करवा दिया? क्या ये डिक्टेटरशिप नहीं है कि देश का प्रधानमंत्री पीएम केयर्स फंड बनाकर अरबों-खरबों का फंड जुटाता है लेकिन उसे के बारे में किसी को बताने के लिए पाबंद नहीं?

क्या ये हिटलरशाही नहीं है कि सोशल मीडिया पर ऑक्सीजन मांग रहे मजबूर लोगों की संपत्ति जब्त करने के आदेश दे दिये जाते हैं? क्या लोकतंत्र में सच्ची खबरों को दिखा रहे पत्रकारों को जेल में ठूंस देना आपातकाल नहीं माना जाएगा? क्या ये आपातकाल नहीं है कि देश में चुनाव आयोग जैसे संस्थान पर सत्ताधारी पार्टी के समर्थकों का कब्ज़ा है? क्या ये इमरजेंसी नहीं है कि देश की सबसे बड़ी अदालत के मुखिया की कुर्सी पर बैठे शख्स को फैसलों के इनाम के तौर पर राज्यसभा भेज दिया जाता है और कोई खुलकर विरोध भी नहीं कर पाता? क्या आप बस्तर में आदिवासियों के नरसंहार को आपातकाल नहीं मानते?

क्या आप जल-जंगल और जम़ीन को पूंजीपतियों को बेच देने को इस नज़र से नहीं देखते कि देश में अब वंचित तबकों के तमाम अधिकार छीने जा रहे हैं? क्या आपको हाथरस की बेटी की लाश को लावारिशों की तरह पेट्रोल छिड़कर जला देना आपातकाल की याद नहीं दिलाता? क्या आपको रोज़ाना औसतन 10 दलित महिलाओं के साथ रेप या गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया जाना ये नहीं बताता कि अब यहां कानून का राज नहीं है? रोज़ाना दलित उत्पीड़न के 100 से ज्यादा मामले दर्ज़ होने को हम इमरजेंसी ना कहें तो और क्या कहें? क्या एक महिला के अपने मर्ज़ी से जीवनसाथी चुनने के अधिकार पर लव जिहाद जैसे आरोप मढ़ना आपातकाल नहीं है?

क्या गाय के नाम पर दलितों-मुसलमानों की सरेआम भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर देना आपातकाल नहीं माना जाना चाहिए? क्या देश क्या देश की सारी संपत्ति को कौड़ियों के भाव नीलाम कर देना लोकतंत्र को परिभाषित करता है? क्या बैंक से लेकर एयरपोर्ट और पेट्रोलियम से लेकर रेलवेज तक को प्राइवेट हाथों में सौंप देना आपातकाल नहीं है? इसीलिए हम कह रहे हैं कि इंदिरा गांधी होती तो आज बहुत पछताती।

इंदिरा से गलती बस इतनी हुई कि उन्होंने घोषणा की थी, वो मोदी सरकार की तरह शातिर तरीक़े से अघोषित आपातकाल नहीं लगा पाईं और इतिहास के पन्नों में हमेशा-हमेशा के लिए बदनाम हो गईं। आज वो होतीं तो बहुत पछतातीं।

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