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डॉ लक्ष्मण यादव ने यूं दीं ‘राजनीति के पहलवान’ मुलायम सिंह यादव को जन्मदिन की बधाई

मुलायम सिंह जैसे नेताओं की सियासी अहमियत व तारीख़ी इबारतों को ख़ारिज़ कत्तई नहीं किया जा सकता - डॉ लक्ष्मण यादव

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Photo - Samajwadi Party

देश के सबसे बड़े सूबे के एकाधिक बार मुख्यमंत्री रहे, समाजवादी वैचारिकी के लिबास में किसानों की सियासत करने वाले, ‘धरती पुत्र’ व ‘राजनीति के पहलवान’ जैसे विशेषणों से ख्यातिलब्ध मुलायम सिंह यादव जी का आज जन्मदिन है. उन्हें बधाई

उस मुलायम सिंह का, जिसने अयोध्या, काशी, मथुरा के नाम पर धार्मिक रूप घोर विवादित उत्तर प्रदेश जैसे घनघोर संवेदनशील सूबे में सियासत की पारी के शुरुआती दिनों में ही संविधान विरोधी कारसेवकों पर गोली चलवाई. जिस तारीख़ी क़दम ने इस मुल्क़ के अकलियतों का मुल्क़ के आईन पर दरकता भरोसा फिर से क़ायम किया।

उस मुलायम सिंह का, जिसने साम्प्रदायिक आधार पर कहें तो तलवार की धार पर खड़े उत्तर भारत के युवाओं, ख़ासकर पिछड़े तबके को साम्प्रदायिकता के ईंधन से बचाते हुए निकालकर उन्हें अपने हक़ हुक़ूक़ के लिए एकजुट कर दंगाई सियासत से मुठभेड़ की और इसमें ऐतिहासिक तौर पर सफ़ल भी हुए।

उस मुलायम सिंह का, जिसने ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा हो गए जय श्री राम’ जैसे अप्रत्याशित, ऐतिहासिक व अद्वितीय सियासी जुमले के साथ हिंसक, दंगाई, संविधान विरोधी मंदिर आंदोलन के रथ को रोक दिया था. जिसके चलते ‘मुल्ला मुलायम’ जैसे निहायत स्तरहीन आरोपों तक को झेलते आए।

उस मुलायम सिंह का, जिसने ‘रोटी कपड़ा सस्ती हो, दवा पढ़ाई मुफ़्ती हो’ और ‘सिंचाई, पढ़ाई, दवाई मुफ़्त’ जैसे सियासी नारों पर चुनाव लड़े, वोट माँगे और जीत कर अपने शासन काल में इन जुमलों को अमली जामा भी पहनाने में क़ामयाबी हासिल की. आम जनता की आवाज़ में बोले व काम किया।

उस मुलायम सिंह का, जिसने रक्षामंत्री रहते हुए चीन को भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताया, सियाचिन का दौरा कर जवानों का हौसला बढ़ाने वाले रक्षामंत्री बने, शहीद जवानों के पार्थिव शरीर को उनके पैतृक घर तक लाने का प्रावधान शुरू करवाया।

उस मुलायम सिंह का, जो डॉ. राममनोहर लोहिया, चौधरी चरणसिंह, चंद्रशेखर, ताऊ देवीलाल जैसे ज़मीनी नेताओं के साथ सियासत के दावपेंच सीखे और हर दौर में सियासी चालें चलीं और सफ़ल भी हुए. उनसे सीखा कि दंगाईयों के सामने न कभी झुकना है और न डरकर रुकना है।

इस देश के किसी भी नेता की किन्हीं कमियों को सायास उभारकर हम उसकी छवियों को चंद खाँचों में क़ैद कर नफ़रत करते हैं. ऐसे सियासी पूर्वाग्रहों के शिकार सबसे ज़्यादा बहुजन नेता ही हुए. यह सही है कि आलोचना के पर्याप्त मौके इन नेताओं ने दिए, मुलायम सिंह की भी आलोचना आप कर सकते हैं।

मग़र हम ऐसे नेताओं को मात्र ख़ारिज़ करने के एकांगी पैरोकार हो चले हैं कि मुलायम सिंह ने बहुतों को धोखे दिए, मौके को पूरा नहीं भुनाया, सामाजिक न्याय नहीं किया. आप इस आधार पर आलोचना कर भी सकते हैं. मगर इन जैसों ने जितना किया, उस हिस्से का सम्मान, उन कामों का श्रेय तक न दे सकें; तो फिर कैसी बौद्धिक व सियासी निष्पक्षता?

मुलायम सिंह जैसे नेताओं की सियासी अहमियत व तारीख़ी इबारतों को ख़ारिज़ कत्तई नहीं किया जा सकता. हमसे बुरे सियासी वक़्त में भी ये विचारों के साथ सड़क पर संघर्ष करते रहे. लोहिया के नाम पर गोडसे गोलवकर के वारिसों से लड़ते रहे. कांग्रेस विरोध कर एक नई सियासी ज़मीन रची. उस ज़मीन की अहमियत समझनी हो तो उस ज़माने के दंगाईयों से उनके अफ़साने सुनिएगा।

आभिजात्य पूर्वाग्रही बौद्धिक विश्लेषकों से उधार लिए चश्मों ने एक बहुत बड़ी सियासी दुनिया पर काला पर्दा डाल दिया है. चश्मा उतारिए, बहुत कुछ अच्छे से और पूरा देख पाएँगे आप. ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएं, राजनीति के इस दिग्गज़ को। मुलायम सिंह जी को स्वस्थ व दीर्घायु होने की कामना.

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