Home भारत दलित उत्पीड़न मामला : मनुवादियों की कुप्रथाओं का पालन ना करने पर...

दलित उत्पीड़न मामला : मनुवादियों की कुप्रथाओं का पालन ना करने पर दलित परिवारों का किया गया सामाजिक बहिष्कार !

सवर्णों के पालकी में दूल्हा और दुल्हन को ले जाने के फैसले का इंकार करने पर दलितों का किया बहिष्कार।

379
0
blank
www.theshudra.com

ओडिशा के पुरी जिले से जातिवाद का भयानक चेहरा सामने आया है। यहां दलित परिवारों को सवर्ण जाति के लोगों के आदेश को ना मानने की वजह से सालों से सामाजिक बहिष्कार का दंश झेलना पड़ रहा है। दलित परिवारों का अपराध सिर्फ इताना था कि उन्होंने मनुवादियों द्वारा बनाई जा रही कुप्रथाओं का पालन करने से इंकार कर दिया।

तिरपाल के घरों में जिंदगी जी रहे परिवार

पुरी के नाथपुर गांव में 40 दलित परिवार अपना गांव छोड़कर मिट्टी की बनी दीवारों पर बांस लगाकर और तिरपाल की चादरें डालकर रहने पर मजबूर हैं, लेकिन कुछ सालों पहले ये भी अपने गांव में संतुष्ट जीवन जी रहे थे। नाथपुर से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर इनका अपना गांव ब्रह्मपुर एक द्वीप पर बसा हुआ था। जहां इनके अपने पक्के घर भी थे।

गांव के मनुवादियों ने बनाई ये प्रथा

गांव के मनुवादियों द्वारा बनाई गई प्रथा के मुताबिक दलित समुदाय के सदस्य सवर्ण जाति के परिवारों की बारात में पालकी लेकर जाएं और शादी में मिलने वाले खाने के बदले दूल्हा और दुल्हन को गांव के चारों ओर ले जाकर गांव की पूरी परिक्रमा करवाए। साल 2013 में दलित समुदाय के लोगों ने पालकी ले जाने से मना कर दिया था। इसके बाद उन्हें अपने ही घरों से निकाल दिया गया।

दलितों के लिए बंद कीं राशन की दुकाने

साल 2021 में दलित समुदाय का एक युवक नशे की हालत में गांव जाकर फेरीवाले से मिठाई खरीद लाया, जिसके बाद जातिवादियों ने विवाद खड़ा कर दिया और नए आदेश दलितों पर थौंप दिए, जिसके तहत दलित समुदाय के सदस्यों को गांव में प्रवेश करने, जुलूस निकालने या अपने रिश्तेदारों को गांव में आमंत्रित करने से मना कर दिया गया। दलित समाज के लिए राशन की दुकानों को स्थायी रूप से बंद कर दिया गया साथ ही गांव के कुएं और तालाब के इस्तेमाल से भी मना कर दिया गया।

दलितों ने नहीं चुनी गुलामी की जिंदगी

33 साल के दलित युवक संग्राम भोई ने बताया कि उनकी एकमात्र शर्त थी कि हम बिना किसी पारिश्रमिक के फिर से पालकी ले जाना शुरू कर दें। जब हमने पालकी ले जाने से मना कर दिया, तो उन्होंने हमें मछली पकड़ने के अधिकार से वंचित कर दिया। बस यही एकमात्र हमारी आजीविका का स्रोत था। जिसके बाद हमारे गांव में समुदाय के लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया। स्कूलों से बाहर कर दिए गए युवक काम की तलाश में चेन्नई, बेंगलुरु की ओर पलायन कर गए और बाकी बचे दूसरे लोग आस-पास के गांवों में खेत मजदूर के रूप में काम करने लगे। हमने गुलामी की जिंदगी नहीं चुनी।

इस मामले पर सवर्ण जाति के सदस्यों का कहना है कि ये आरोप सही नहीं हैं। हमने सिर्फ उनेक अपने निजी इलाके में प्रवेश करने पर आपत्ति जताई है। इस मामले को लेकर दलित समुदाय के लोग प्रशासन से कई बार मदद की गुहार लगा चुके हैं लेकिन उनकी कोई मदद नहीं की गई है।

( ये खबर द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर आधारित है )

  telegram-follow   joinwhatsapp     YouTube-Subscribe

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here