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संविधान दिवस विशेष : क्यों सिर्फ डॉ आंबेडकर को ही संविधान निर्माता कहते हैं? जानिए 5 कारण

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भारत का संविधान लिखने का श्रेय सिर्फ़ डॉ आंबेडकर को ही क्यों दिया जाता है ? संविधान सभा में क़रीब 300 सदस्य थे तो फिर डॉ आंबेडकर को ही संविधान निर्माता क्यों कहते हैं ? इस लेख में आगे मैं आपको ऐसे 5 कारण बताऊँगा जिन्हें जानने के बाद आप ये समझ जाएँगे कि क्यों डॉ आंबेडकर को ही संविधान निर्माता कहा जाता है ?

क्यों मनाया जाता है संविधान दिवस ?

26 नवंबर को हमारे देश में संविधान दिवस मनाया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि 26 नवंबर 1949 को ही भारत का संविधान बनकर तैयार हुआ था। डॉ आंबेडकर संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष थे। लेकिन मनुवादियों की तरफ़ से ये दुष्प्रचार किया जाता है कि संविधान तो कॉपी-पेस्ट है और संविधान सभा के बाक़ी सदस्यों ने भी बहुत मेहनत की थी लेकिन सारा श्रेय डॉ आंबेडकर को ही दे दिया जाता है। लेकिन हक़ीक़त ये है कि संविधान बनाने में डॉ आंबेडकर से ज़्यादा मेहनत किसी ने नहीं की थी। 

पहला कारण –  सबसे ज़्यादा काम अकेले किया

कहने के लिए संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी में कुल 7 लोग थे लेकिन डॉ आंबेडकर को ज़्यादातर समय अकेले ही काम करना पड़ा। बाबा साहब ने लगातार 141 दिनों तक संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन के रूप में अकेले काम किया क्योंकि बाक़ी के 6 सदस्य अलग-अलग कारणों से संविधान बनाने के काम में शामिल ही नहीं हो पाए थे। 

संविधान सभा के सदस्य टी.टी कृष्णामाचारी ने संविधान सभा के सामने बताया था ‘यूँ तो संविधान की ड्राफ्टिंग कमेंटी में 7 सदस्य थे लेकिन एक ने त्यागपत्र दे दिया था। दूसरे सदस्य की मृत्यु हो गई, तीसरे सदस्य अमेरिका चले गए। चौथे सदस्य राज्य के कार्यों में इतने व्यस्त थे कि कार्यवाही में शामिल ही नहीं हुए। पाँचवें और छठे सदस्य दिल्ली से बहुत दूर थे और ख़राब सेहत के कारण संविधान बनाने के काम में शामिल नहीं हुए। इसलिए हुआ ये कि संविधान बनाने का सारा काम अकेले डॉ आंबेडकर को ही पूरा करना पड़ा।’

ये बयान ख़ुद संविधान सभा के सदस्य टी.टी कृष्णामाचारी का है। इसी से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि क्यों डॉ आंबेडकर को ही संविधान निर्माता कहा जाता है? सेहत तो डॉ आंबेडकर की भी बहुत ख़राब रहती थी लेकिन उन्होंने ख़राब सेहत के बावजूद अकेले ही सबसे ज़्यादा काम किया। 

दूसरा कारण – सबसे काबिल थे डॉ आंबेडकर

आज़ादी के बाद भारत का संविधान लिखने के लिए किसी ऐसे आदमी की तलाश थी जो दुनिया भर के संविधानों का अध्ययन कर सके, क़ानून पेचीदगियों को समझ सके और भारतीय समाज के लिहाज़ से एक मुकम्मल दस्तावेज़ तैयार कर सके। पहले देश में ऐसे योग्य आदमी की तलाश की गई और फिर कुछ लोगों ने विदेश से संविधान विशेषज्ञों को बुलाने का प्रस्ताव दिया गया। लेकिन यहाँ समस्या ये थी कि आज़ाद भारत का संविधान भला किसी विदेशी के हाथों कैसे लिखवाया जा सकता था।

बहुत मंथन और माथा-पच्ची के बाद कांग्रेस और देश के अन्य बड़े नेताओं ने डॉ आंबेडकर का नाम तय किया क्योंकि डॉ आंबेडकर से ज़्यादा पढ़ा-लिखा व्यक्ति उस समय पूरे देश में कोई नहीं था इसलिए डॉ आंबेडकर की क़ाबिलियत को देखते हुए उन्हें ड्राफ्टिंग कमेटी का चेयरमैन चुना गया था। डॉ आंबेडकर की मेरिट के आगे कोई नहीं ठहरता था और उन्होंने इस ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया। 

तीसरा कारण – संविधान के कच्चे मसौदे को समेटा 

संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार सर बी.एन राव ने ड्राफ्टिंग कमेटी के सामने संविधान का कच्चा मसौदा पेश किया था जो दुनिया भर के संविधानों पर आधारित था। यानी सर बी.एन राव ने बहुत से संविधानों से कुछ-कुछ बातों को लेकर कच्चा मसौदा दिया था। डॉ आंबेडकर ने इस कच्चे मसौदे का अध्ययन किया, उसमें से अच्छे अनुच्छेदों को चुना, उनकी व्याख्या की और उसे समेटने का काम किया।

इस तरह डॉ आंबेडकर ने अपनी क़ाबिलियत से एक ना सिर्फ कच्चे मसौदे को समेटा बल्कि दुनिया भर के संविधानों और कानूनों का अध्ययन कर कई अच्छी बातें भारतीय संविधान में शामिल की। कड़ी मशक्कत के बाद उन्होंने एक मुकम्मल दस्तावेज़ तैयार किया। संविधान के कच्चे मसौदे को समझाते हुए 17 दिसंबर 1946 को डॉ आंबेडकर ने 3310 शब्दों में अपना पहला भाषण दिया था।

चौथा कारण – क़ानून एक्सपर्ट के तौर पर शानदार काम 

डॉ आंबेडकर लंदन के ग्रेज़-इन से बैरिस्टर की पढ़ाई करके लौटे थे। उस समय उनके पास दो-दो पीएचडी की डिग्रियाँ थी। ऐसे में उन्हें क़ानून की बहुत अच्छी समझ थी। संविधान के अनुच्छेद अक्सर काफ़ी मुश्किल और आसानी से समझ में ना आने वाले होते थे, ऐसे में डॉ आंबेडकर संविधान सभा के सामने आने वाले तमाम मुश्किल सवालों का जवाब देते थे।संविधान सभा की कार्यवाही में बाबा साहब रोज़ाना औसतन 10 बार खड़े होकर बोलते थे लेकिन कई बार उन्हें एक दिन में 20-25 बार खड़े होकर सदन को समझाना पड़ता था। कई बार विरोधाभासी दिखने वाले अनुच्छेदों पर उन्हें घटों बहस करनी पड़ती थी।

डॉ आंबेडकर उन चंद लोगों में शामिल थेजो ड्राफ्टिंग कमेटी का सदस्य होने के साथसाथ बाकी 15 कमेटियों में से कई कमेटियों के सदस्य भी थे। संविधान का प्रारूप तैयार होने के बाद उसे जनता की प्रतिक्रिया के लिए रखा गया था। इस प्रतिक्रिया में 7635 संशोधन पारित हुए। बाबा साहब ने इन संशोधनों को पढ़कर 5162 संशोधनों को रिजेक्ट किया और 2473 संशोधनों को संविधान में समायोजित किया। 

पाँचवा कारण – प्रमुख लेखकों-विचारकों ने डॉ आंबेडकर को सराहा 

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा लिखने वाले मशहूर लेखक माइकेल ब्रेचर ने अपनी पुस्तक नेहरू पॉलिटिकल बायोग्राफी में माइकल ब्रेचर ने डॉ आंबेडकर को भारतीय संविधान का वास्तुकार माना और उनकी भूमिका को संविधान के निर्माण में फील्ड जनरल के रूप में रेखांकित किया।

डॉ अंबेडकर की जीवनी लिखने वाले क्रिस्तोफ जाफ्रलो अपने पुस्तक में लिखते हैं कि हमें ड्राफ्टिंग कमेटी की भूमिका का भी एक बार फिर आकलन करना चाहिए। यह कमेटी सिर्फ संविधान के प्रारम्भिक पाठों को लिखने के लिए जिम्मेदार नहीं थीबल्कि उसको यह जिम्मा सौंपा गया था कि वह विभिन्न समितियों द्वारा भेजे गए अनुच्छेदों के आधार पर संविधान का लिखित पाठ तैयार करेजिसे बाद में संविधान सभा के सामने पेश किया जाए,सभा के समक्ष कई मसौदे पढ़े गए और हर बार ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों ने चर्चा का संचालन और नेतृत्व किया था। अधिकांश बार यह जिम्मेदारी आंबेडकर ने ही निभाई थी।’

इसी तथ्य को रेखांकित करते हुए प्रमुख समाजशास्त्री प्रोफेसर गेल ऑम्वेट भी लिखती हैं कि ‘संविधान का प्रारूप तैयार करते समय अनके विवादित मुद्दों पर अक्सर गरमागरम बहस होती थीइन सभी मामलों के संबंध में आंबेडकर ने चर्चा को दिशा दीअपने विचार व्यक्त किए और मामलों पर सर्वसम्मति लाने का प्रयास किया।

इस तरह बाबा साहब ने 2 साल 11 महीने और 18 दिन में भारत को एक ऐसा संविधान बनाकर दिया जो जाति, लिंग, भाषा, क्षेत्र और धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता, एक ऐसा संविधान जो हर किसी को समानता, स्वतंत्रता और बंधुता का पाठ पढ़ाता है। एक ऐसा संविधान जो सामाजिक न्याय की गारंटी है। इसीलिए डॉ बी आर आंबेडकर को भारत के संविधान का निर्माता कहा जाता है।

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