Home डॉ. आंबेडकर शुक्रिया बाबा साहब, आपकी बदौलत ही आज मेरी गिनती इंसानों में होती...

शुक्रिया बाबा साहब, आपकी बदौलत ही आज मेरी गिनती इंसानों में होती है !

मैं आज पढ़-लिख पा रहा हूं, शासन-प्रशासन में हिस्सेदार हूं और अपने अधिकारों को पहचानता हूं। मैं अक्सर सोचता हूं कि अगर उस वक्त डॉ आंबेडकर ना होते तो क्या आज मेरा आज़ाद वजूद होता?

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130 साल पहले आज ही के दिन इस धरती पर ऐसे व्यक्ति ने जन्म लिया था जिसकी बदौलत आज मेरी गिनती इंसानों में होती है। मैं आज पढ़लिख पा रहा हूं, शासनप्रशासन में हिस्सेदार हूं और अपने अधिकारों को पहचानता हूं। मैं अक्सर सोचता हूं कि अगर उस वक्त डॉ आंबेडकर ना होते तो क्या आज मेरा आज़ाद वजूद होता? जवाब की कल्पना आप कर सकते हैं। 

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डॉ. अंबेडकर 20वीं सदी के ऐसे महानायक थे जिन्होंने करोड़ों लोगों को ना सिर्फ इंसान का दर्जा दिलाया बल्कि संविधान के रूप में उनके बुनियादी मानवाधिकारों की गारंटी भी दी। 20वीं शताब्दी में पूरी दुनिया में उपनिवेशी शासन से लोगों को मुक्ति मिली, इस सदी में इंसान ने खुद को एक आज़ाद इंसान साबित करने और अपने अधिकारों के लिए ज़बरदस्त संघर्ष किया। अंग्रेजों ने भारतीयों को सिर्फ 200 साल तक गुलाम बनाकर रखा लेकिन इस भारतीय उपमहाद्वीप में कुछ लोग ऐसे थे जिन्हें हज़ारों सालों तक गुलामी की ऐसी जंज़ीरों में जकड़ कर रखा गया जिन्हें कोई तोड़ ना सका।

पढ़नेलिखने की मनाही, सार्वजनिक कुओं और तालाब से पानी पीने की मनाही, संपत्ति नहीं रख सकते, बिना मज़दूरी के जीवन भर काम करनापशुओं से भी बदतर जीवन जीने के लिए मजबूर होना, ब्राह्मणवादियों का मलमूत्र साफ करना और मरे हुए पशुओं की चमड़ी उधड़वाने का काम करने वाले शूद्रों-अतिशूद्रों को आज़ाद ख्याल इंसान बनाना क्या किसी उपनिवेशी महाशक्ति को हराने से कम है। देश की आज़ादी में लाखोंकरोड़ों लोग साथ थे लेकिन लाखोंकरोड़ों दलितों को वर्णवाद की दासता से आज़ादी दिलाने की लड़ाई डॉ आंबेडकर ने अकेले ही लड़ी।

चाहे महाड़ सत्याग्रह के ज़रिए दलितों को तालाब से पानी पीने का अधिकार दिलाने की बात हो या इंग्लैंड में गोलमेज सम्मेलन में भारत में दलितों के हक की नुमाइंदगी करने का मामला हो, चाहे रात-रात जागकर दुनिया भर की किताबों का अध्ययन करना हो या फिर भूखे पेट रहकर मूकनायक और बहिष्कृत भारत जैसे समाचार पत्र निकालना, चाहे दुष्ट मनु के विधान मनुस्मृति को सरेआम आग में झोंकना हो या फिर नम आँखों से पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर कर गांधी को जीवन दान देना… चाहे एक के बाद एक अपनी औलाद को दफ़नाना हो या फिर इस देश का संविधान रच देना…बाबा साहब डॉ आंबेडकर ने बिना रुके अपने संघर्ष को जारी रखा। वो ना थके और ना हारे… मनुवादियों के हमले और धमकियाँ भी उनका हौसला नहीं तोड़ पाई।तमाम विपरित परिस्थितियों के बावजूद खुदपढ़ लिखकर अपने आप को इस काबिल बनाया कि वो बड़े से बड़े विद्वान से तर्क कर सकें। 

ज़रा सोचिए कक्षा में बाहर बैठकर पढ़ने को मजबूर एक छात्र को उस वक्त कैसा लगा होगा जब वो कोलंबिया यूनिवर्सिटी और लंडन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स की इमारत की सीढ़ियां चढ़ रहा होगा। एक छात्र के रूप में तमाम कठिनाइयों से लड़कर सफलता के शिखर पर पहुंचने तक डॉ अंबेडकर का जीवन आज के तमाम छात्रों के लिए प्रेरणादायक है। घरबार छोड़कर अच्छी शिक्षा और रोज़गार की तलाश में बड़े शहरों में संघर्ष करने वाले छात्रों को उनके छात्र जीवन के संघर्ष से प्रेरणा लेनी चाहिए।

बाबा साहब डॉ आंबेडकर और माता रमाई का जीवन संघर्ष भी तमाम कपल्स के लिए एक मिसाल है। बाबा साहब कहते थे, पति और पत्नी का रिश्ता एक दोस्त का रिश्ता होना चाहिए। इससे हमें ये शिक्षा मिलती है कि कैसे हम बहुजन मिशन में अपने जीवनसाथी का साथ दें। 

आज जब मनुवादी ताक़तें चरम हैं, बाबा साहब के विचार ही हमें ब्राह्मणवादियों से लड़ने की शिक्षा देते हैं। मनुवाद बनाम आंबेडकरवाद की इस लड़ाई में आंबेडकरवाद ही एक उम्मीद की किरण दिखाई पड़ता है। अपनी किताब Pakistan or The Partition of India (1946, Page-358) में बाबा साहब लिखते हैं ‘यदि हिंदू राज एक हकीकत बन जाता है, तो इसमें कोई शक नहीं कि ये इस देश के लिए सबसे बड़ी आपदा होगी। कोई फर्क नहीं पड़ता कि हिंदू क्या कहते हैं, हिंदू धर्म समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे के लिए एक खतरा है। यह लोकतंत्र के लिए असंगत है। हिंदू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।’

आज इस ख़तरे की सबसे ज़्यादा आशंका है, ऐसे में बाबा साहब के बताए रास्ते पर चलकर ही हम इस ख़तरे से निपट सकते हैं। डॉ आंबेडकर ने हिंदू धर्म द्वारा पोषित वर्णवाद की बखिया उधेड़कर रख दी। अपनी पुस्तकजाति का खात्मामें डॉ आंबेडकर लिखते हैं, “मैं हिंदूओं की आलोचना करता हूं, मैं उनकी सत्ता को चुनौती देता हूं इसलिए वो मुझसे नफरत करते हैं। मैं उनके लिए बाग में सांप की तरह हूं।शूद्रों-अतिशूद्रों को जिन धर्मग्रंथों को पढ़ने की इजाजत नहीं थी उन्हीं ग्रंथों द्वारा स्थापित वर्ण व्यवस्था और भेदभाव के सिद्धांतों को डॉ आंबेडकर ने अपने सवालों से धूल चटा दी। अपनी किताबअछूत कौन थे और वो अछूत कैसे बनेमें डॉ अंबेडकर लिखते हैं,सभी मनुष्य एक ही मिट्टी के बने हुए हैं और उन्हें यह अधिकार भी है कि वे अपने साथ अच्छे व्यवहार की मांग करें’

ऋग्वेद के पुरुषसुक्ता में जिन शूद्रों को ब्रह्मा के पैरों से उत्पन्न हुआ बताया गया है वहां मानव के प्राकृतिक अधिकारों की बात करना अपने आप में एक क्रांति है।महिलाओं को मातृत्व के अवकाश का अधिकार दिलाने से लेकर भारतीय रिजर्व बैंक की संकल्पना देने तक में डॉ अंबेडकर की आधुनिक सोच का परिचय मिलता है। हम उनके जीवन से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

आज जब बहुजन आगे बढ़ रहे हैं तो उनके सामने चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। जातिवाद का रोग अभी भी मनुवादियों में जड़े जमाए बैठा है। हर रोज SC/ST समुदाय के लोगों के खिलाफ अपराध के औसतन 100 मामले दर्ज़ होते हैं, इनमें जातीय भेदभाव, उत्पीड़न, हत्या, रेप, गैंगरेप और दूसरे अपराध शामिल हैं। ऐसे समय में जब दलितों के खिलाफ अपराध में न्याय की दर सिर्फ 14 प्रतिशत है उस वक्त SC/ST एक्ट को कमज़ोर किया जा रहा है। आरक्षण को अघोषित तरीके से कॉलेजविश्वविद्यालयों में खत्म किया जा रहा है। तरहतरह से फेलोशिप खत्म करके, स्कॉलरशिप की राशि घटाकर, कई गुणा फीस बढ़ाकर हमें पढ़नेलिखने से रोकने की कोशिश हो रही है। प्राइवेटाइज़ेशन और लेटरल एंट्री के बहाने चंद जातियों को फायदा पहुंचाया जा रहा है। आज भी हमें स्कूलकॉलेज से लेकर दफ्तरों तक में जाति का दंश झेलना पड़ता है। 

ऐसे समय में हमें डॉ आंबेडकर का संदेश याद रखना चाहिए। अपनी किताब गांधी और अछूतों का उद्धारमें बाबा साहब ने लिखा हैं, ‘वंचित तबके के युवाओं को मेरा यह पैगाम है कि एक तो वे शिक्षा और बुद्धि में किसी से कम रहें, दूसरे ऐशोआराम में पड़कर समाज का नेतृत्व करें। तीसरे, समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी संभाले और समाज को जागृत और संगठित कर उसकी सच्ची सेवा करें

बाबा साहब की ये सीख हमें हमेशा याद रखनी चाहिए, क्योंकि वो थे तो आज हम हैंहमारी तरफ़ से आप सबको बाबा साहब की 130वीं जयंती की ढेरों बधाई।

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