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शहादत दिवस विशेष : क्यों 32 अंग्रेज सैनिकों को मौत के घाट उतारने वाली ऊदा देवी पासी को अंग्रेज़ भी सैल्यूट करते थे ?

शहादत दिवस विशेष : दलित वीरांगना की सच्ची कहानी जिन्हें इतिहासकारों ने इतिहास के पन्नों में कभी उचित जगह नहीं दी।

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एक महिला की ऐसी वीरता देख अंग्रेज अफसर भी उन्हें सैल्यूट किए बिना ना रह सके थे (फोटो-इंटरनेट)

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अंग्रेज सेना के अफसर  कोलिन कैम्पबेल की अगुवाई में ब्रिटिश सैनिक एक पीपल के पेड़ पर अंधाधुंध फायरिंग कर रहे थे… एक के बाद एक गोली अंग्रेजों की बंदूकों से निकल रही थी… जबरदस्त फायरिंग के बाद पीपल के पेड़ से लाश गिरी…. बदन गोलियों से छलनी हो चुका था… कपड़े फट चुके थे… अंग्रेज अफसर कैम्पबेल ने लाश को करीब जाकर देखा तो वो हैरान रह गए… उन्होंने तुरंत अपनी टोपी उतारी और उस लाश को सैल्यूट किया… वो लाश ऊदा देवी पासी की थी… जिन्होंने मरने से पहले कैम्पबेल के 32 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया था… एक महिला की ऐसी वीरता देख अंग्रेज अफसर भी उन्हें सैल्यूट किए बिना ना रह सके….

बहुजन क्रांतिकारियों को किताबों से बाहर कर दिया

आजादी की लड़ाई में समाज के सभी वर्गों और जातियों के लोग थे। इसके बावजूद इतिहास में उन्हीं लोगों के नाम दर्ज किया गया, जो समाज के अगड़े वर्ग से आते थे। मनुवादियों ने मंगल पांडे को तो हीरो बना दिया लेकिन तिलका मांझी, सिदोकान्हू, झलकारी बाई और ऊदा देवी पासी जैसे बहुजन नायक-नायिकाओं के लहू को इतिहास की किबातों से बाहर कर दिया।

पासी जाति से थीं विरांगना ऊदा देवी 

उत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास उजिरियांव गांव की ऊदा देवी एक दलित वर्ग की पासी जाति में पैदा हुई थीं। बचपन से वह जुझारू स्वभाव की थीं। उनके पति मक्का पासी अवध के नवाब वाजिद अली शाह की पलटन में एक सैनिक थे। देशी रियासतों पर अंग्रेजों के बढ़ते प्रभाव के मद्देनज़र जब वाजिद अली शाह ने महल की रक्षा के लिए महिलाओं का सुरक्षा दस्ता बनाया तो ऊदा देवी को भी नियुक्त किया। अपनी बहादुरी और तुरंत निर्णय लेने की उनकी क्षमता से नवाब की बेगम और देश के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की नायिकाओं में एक बेगम हजरत महल बहुत प्रभावित हुईं। नियुक्ति के कुछ ही दिनों बाद में ऊदा देवी को बेगम हज़रत महल की महिला सेना की टुकड़ी का कमांडर बना दिया गया।

16 नवंबर 1857 को कोलिन कैम्पबेल के नेतृत्व में अंग्रेज सैनिकों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत सिकंदर बाग़ की उस समय घेराबंदी की, जब विद्रोही सैनिक या तो सो रहे थे या बिल्कुल ही असावधान थे। (फोटो-इंटरनेट)

ऊदा देवी के पति भी शहीद हो गए थे

जब 10 मई 1857 को मेरठ के सिपाहियों द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध छेड़ा गया संघर्ष तेजी से पूरे उत्तर भारत में फैलने लगा था तब लखनऊ के क़स्बा चिनहट के निकट इस्माईलगंज में हेनरी लारेंस के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कम्पनी की फौज की मौलवी अहमदउल्लाह शाह की अगुवाई में संगठित विद्रोही सेना से ऐतिहासिक लड़ाई हुई। चिनहट की इस ऐतिहासिक लड़ाई में विद्रोही सेना की विजय तथा हेनरी लारेंस की फौज का मैदान छोड़कर भाग खड़ा होना प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी। देश को गौरवान्वित करने वाली और स्वाधीनता सेनानियों का मनोबल बढ़ाने वाली इस लड़ाई में सैकड़ों दूसरे सैनिकों के साथ मक्का पासी की भी शहादत हुई थी। ऊदा देवी ने अपने पति की लाश पर उनकी शहादत का बदला लेने की कसम खाई थी। अपने पति के बलिदान का प्रतिशोध लेने का वह मौका ऊदा देवी को मिला चिनहट के महासंग्राम की अगली कड़ी सिकंदर बाग़ की लड़ाई में।

सिकंदरबाग में अंग्रेजों ने धोखे से हमला कर दिया था

अंग्रेजों की सेना चिनहट की पराजय का बदला लेने की तैयारी कर रही थी। उन्हें पता चला कि लगभग दो हजार विद्रोही सैनिकों ने लखनऊ के सिकंदर बाग में शरण ले रखी है। 16 नवंबर 1857 को कोलिन कैम्पबेल के नेतृत्व में अंग्रेज सैनिकों ने एक सोचीसमझी रणनीति के तहत सिकंदर बाग़ की उस समय घेराबंदी की, जब विद्रोही सैनिक या तो सो रहे थे या बिल्कुल ही असावधान थे। ऊदा के नेतृत्व में वाजिद शाह की स्त्री सेना की टुकड़ी भी हमले के वक्त इसी बाग में थी। असावधान सैनिकों की बेरहमी से हत्या करते हुए अंग्रेज सैनिक तेजी से आगे बढ़ रहे थे। हजारों विद्रोही सैनिक मारे जा चुके थे। पराजय सामने नजर रही थी। मैदान के एक हिस्से में महिला टुकड़ी के साथ मौजूद ऊदा देवी ने पराजय निकट देखकर पुरुषों के कपड़े पहन लिए। हाथों में बंदूक और कंधों पर भरपूर गोलाबारूद लेकर वह पीपल के एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गयी।

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ब्रिटिश सैनिकों को मैदान के उस हिस्से में आता देख ऊदा देवी ने उनपर फायरिंग शुरू कर दी। पेड़ की डालियों और पत्तों के पीछे छिपकर उसने हमलावर ब्रिटिश सैनिकों को सिकंदर बाग़ के उस हिस्से में तब तक प्रवेश नहीं करने दिया था जबतक उनका गोलाबारूद खत्म नहीं हो गया। ऊदा देवी ने अकेले ब्रिटिश सेना के दो बड़े अफसरों कूपर और लैम्सडन सहित 32 अंग्रेज़ सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। गोलियां खत्म होने के बाद ब्रिटिश सैनिकों ने पेड़ को घेरकर उनपर अंधाधुंध फायरिंग की। कोई उपाय देख जब वह पेड़ से नीचे उतरने लगी तो उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया गया।

विरांगना ऊदा देवी की बहादुरी देख अंग्रेज़ दंग रह गए थे

लाल रंग की कसी हुई जैकेट और पैंट पहने ऊदा देवी की लाश जब पेड़ से ज़मीन पर गिरी तो उसका जैकेट खुल गया। कैम्पबेल यह देखकर हैरान रह गया कि वीरगति प्राप्त वह बहादुर सैनिक कोई पुरुष नहीं, एक महिला थी। कहा जाता है कि ऊदा देवी की हैरान कर देने वाली वीरता से अभिभूत होकर कैम्पबेल ने हैट उतारकर उन्हें सलामी और श्रद्धांजलि दी थी।

ऊदा देवी के शौर्य, साहस और शहादत पर भारतीय इतिहासकारों ने बहुत कम लेकिन अंग्रेज अधिकारियों और पत्रकारों ने ज्यादा लिखा। ब्रिटिश सार्जेण्ट फ़ॉर्ब्स मिशेल ने अपने एक संस्मरण में बिना नाम लिए सिकंदर बाग में पीपल के एक बड़े पेड़ के ऊपर बैठी एक ऐसी स्त्री का उल्लेख किया है जो अंग्रेजी सेना के बत्तीस से ज्यादा सिपाहियों और अफसरों को मार गिराने के बाद शहीद हुई थी। लंदन टाइम्स के तत्कालीन संवाददाता विलियम हावर्ड रसेल ने लड़ाई का जो डिस्पैच लंदन भेजा उसमें उसने पुरुष वेश में एक स्त्री द्वारा पीपल के पेड़ से फायरिंग कर अंग्रेजी सेना को भारी क्षति पहुंचाने का उल्लेख प्रमुखता से किया गया था। लंदन के कई दूसरे अखबारों ने भी ऊदा की वीरता पर लेख प्रकाशित किए थे। लंदन टाइम्स में छपी खबरों के आधार पर ही कार्ल मार्क्स ने भी अपनी टिप्पणी में सिकंदर बाग की नायिका का जिक्र किया है।

बहुजन नायक-नायिकाओं ने देश की मिट्टी को लहू से सींचा है

इस देश की मिट्टी को हमारे पूर्वजों ने अपने खून से सींचा लेकिन मनुवादी इतिहासकारों ने कभी उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया… लेकिन अब हमारे नायक-नायिकाओं के अदम्य साहस की कहानी धरती फाड़कर बाहर आ रही है। वीडियो देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

ब्यूरो रिपोर्ट, द शूद्र

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