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शाहू जी महाराज : 118 साल पहले अपने राज्य में आरक्षण लागू करने वाले क्रांतिकारी राजा

पिछड़े तबके का मतलब था गैर-ब्राह्मण… जिस वक्त ब्राह्मण कोल्हापुर की 90 फीसदी नौकरियों और शिक्षा पर काबिज़ थे, उस वक्त शाहू महाराज ने दलित-आदिवासी और पिछड़ों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर सामाजिक न्याय की स्थापना की थी। महज 20 साल की उम्र में महाराज ने शाहू जी ने करीब 28 साल की उम्र में ही ये क्रांतिकारी फैसला लेकर हर किसी को हैरान कर दिया था।

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Shahu ji Maharaj
कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति शाहू जी महाराज

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26 जुलाई 1902.. यानी 118 साल पहले कोल्हापुर के राजा छत्रपति शाहू जी महाराज ने ये ऐलान कर दिया था कि उनके राज में सभीसरकारी नौकरियों और स्कूल-कॉलेजों में अब से दलितों-पिछड़ों और आदिवासियों के लिए 50 फीसदी पद आरक्षित होंगे। शिवाजी महाराजके वंशज शाहू महाराज ने अपने राज्य कोल्हापुर में सामाजिक न्याय को स्थापित करने के लिए कई कदम उठाए… 26जुलाई1902 कोउन्होंने कोल्हापुर के गजट में गैर ब्राह्मणों के लिए 50फीसदी आरक्षण की घोषणा की थी। गजट में लिखा था।

‘महाराज को ये घोषणा करते हुए खुशी महसूस हो रही है कि आज के इस एलान के बाद से राज्य में हर तरह की भर्तियों मेंपिछड़े तबकों के लिए 50 % पद आरक्षित किए जाएंगे। सभी सरकारी दफ्तरों, जिनमें पिछड़े तबके के कर्मचारी 50 % से कम हैं, उन्हें अगली भर्तियों में नियुक्त किया जाएगा।’

पिछड़े तबके का मतलब था गैर-ब्राह्मण… जिस वक्त ब्राह्मण कोल्हापुर की 90 फीसदी नौकरियों और शिक्षा पर काबिज़ थे, उस वक्त शाहू महाराज ने दलित-आदिवासी और पिछड़ों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर सामाजिक न्याय की स्थापना की थी। महज 20 साल की उम्र में महाराज ने शाहू जी ने करीब 28 साल की उम्र में ही ये क्रांतिकारी फैसला लेकर हर किसी को हैरान कर दिया था। ब्राह्मणवादी शोषण के खिलाफ उन्होंने एक ऐसा विद्रोह किया था, जिसके बारे में कोई राजा सोच भी नहीं सकता था।

Jyotiba Phule

न्याय और समानता में यकीन रखने वाले शाहू जी महाराज महात्मा ज्योतिबा फुले से काफी प्रभावित थे… भारत में पिछड़े तबकों के लिए आरक्षण की चर्चा सबसे पहले महात्मा ज्योतिबा फुले ने ही की थी… 1881 में शिक्षा व्यवस्था पर बने हंटर कमीशन के सामने ज्योतिबा फुले ने ये प्रस्ताव पेश किया था कि भारत में जातिवाद और वर्णव्यवस्था के कारण सैकड़ों जातियां गुलाम हैं, इसलिए उन्हें आरक्षण दिया जाना चाहिए। महात्मा फुले ने ब्रिटिश सरकार से पिछड़ों के लिए आरक्षण की पैरवी की और उनके इसी विचार ने शाहू जी महाराज पर भी गहरा असर डाला…उदारवादी विचारों वाले शाहू जी महाराज खुद भी ब्राह्मणवाद का घटिया चेहरा देख चुके थे।

अक्टूबर 1899 में शाहू जी महाराज जब पंचगंगा नदी में धार्मिक अनुष्ठान कर रहे थे, तब उन्होंने नोटिस किया की ब्राह्मण पुजारी वेद मंत्रों का उच्चारण नहीं कर रहा… वेदों की जगह पुजारी पुराण के मंत्र बोल रहा था…महाराज ने टोका तो उसने कह दिया कि क्योंकि मराठा शूद्र वर्ण में आते हैं इसलिए उनके लिए वेदोक्ता नहीं सकता…क्योंकि वेदोक्ता यानी वेदों के मंत्रोच्चरण सिर्फ ब्राह्मणों के लिए होते हैं।

इस घटना से शाहू जी महाराज इतने भड़क गए कि उन्होंने एलान कर दिया कि कोल्हापुर के किसी भी मंदिर-मठ या धार्मिक संगठन को सरकारी खज़ाने से एक भी पैसा नहीं दिया जाएगा… इसके बाद उन्होंने ब्राह्मणवाद के खिलाफ सामाजिक सुधार की अलख जगाई। उदारवादी विचारों वाले शाहू जी महाराज मानते थे कि इस धरती पर पैदा हुए सभी इंसान समान हैं। सबको बराबरी का हक मिलना चाहिए और हर किसी के साथ न्याय होना चाहिए।

Shahu Ji with Ambedkar

बाबा साहब डॉ आंबेडकर के मूकनायक को आर्थिक मदद देने से लेकर बहिष्कृत वर्ग परिषद की बैठक में हिस्सा लेने तक… एक दलित चायवाले गंगाराम कांबले की दुकान पर चाय की चुस्कियां लेने से लेकर प्राथमिक शिक्षा को ज़रूरी बनाने का कानून लाने तक… शाहू जी महाराज की क्रांतिकारी सोच और न्यायप्रियता की झलक साफ साफ देखी जा सकती है। शाहू महाराज के ये विचार हमें हमेशा यूं ही प्रेरित करते रहेंगे।

118 साल पहले अपने राज्य में आरक्षण लागू करने वाला क्रांतिकारी राजा शाहू जी महाराज से जुड़ी वीडियो देखें-

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