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जयंती विशेष : ब्राह्मणवाद की बखिया उधेड़ते संत कबीर के 10 दोहे और उनके मतलब !

हम आपके लिए लेकर आए हैं बहुजन नायक कबीर के 10 ऐसे दोहे जो ना सिर्फ जातिवाद, पाखंडवाद और ब्राह्मणवाद की मुखालफत करते हैं बल्कि हमें अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं।

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ब्राह्मणवाद के खिलाफ अपनी लेखनी से विद्रोह करने वाले महान संत कबीर दास जी की वाणी आज भी जातिवाद और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष का रास्ता दिखाती है। बहुजन परंपरा में कबीर जैसे महानायकों का जीवन हम सबके लिए एक प्रेरणा है, इसीलिए हम आपके लिए लेकर आए हैं बहुजन नायक कबीर के 10 ऐसे दोहे जो ना सिर्फ जातिवाद, पाखंडवाद और ब्राह्मणवाद की मुखालफत करते हैं बल्कि हमें अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं। तो आइए शुरू करते हैं।

1. जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
कबीर कहते हैं ज्ञान का महत्व किसी की जाति या धर्म के आधार पर नहीं होता। ज्ञानी व्यक्ति की जाति और धर्म को किनारे करके उसका सम्मान करना चाहिए। कबीर उदाहरण देते हुए कहते है कि – जिस तरह से मुसीबत में तलवार काम आती है न की उसको ढकने वाली म्यान, उसी तरह किसी मुश्किल में सज्जन का ज्ञान काम आता है, न कि उसकी जाति और धर्म। कबीर यहाँ ज्ञान पर सिर्फ़ ब्राह्मणों के एकाधिकार को चुनौती दे रहे हैं। वेद-पुराणों को रट कर ख़ुद को ज्ञान कहने वाले ब्राह्मणवादियों ने इंसान और इंसान में जन्म के आधार पर भेद किया लेकिन कबीर भेदभाव का नहीं इंसान और इंसान में प्रेम का संदेश देते हैं। वो कहते हैं

2. पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होइ॥
यहाँ कबीर बताते हैं कि लोगों ने तमाम पोथी-पत्रे और ग्रंथ रट लिये लेकिन असल मायनों में कोई भी पंडित नहीं बन सका क्योंकि उनके अंदर दूसरे इंसान के लिए प्यार नहीं है। कबीर कहते हैं इस खोखले ज्ञान की जगह अगर ढाई अक्सर के शब्द प्रेम को पढ़ लें तो आप असली पंडित बन जाएँगे यानी समाज के सभी वर्गों-जातियों के साथ समानता का व्यवहार करेंगे। लेकिन 15वीं शताब्दी में जब कबीर ये सब लिख रहे थे तब कथित ऊँची जाति के लोग अछूतों की छाया भी ख़ुद पर नहीं पड़ने देते थे। किसी अछूत को देखकर ना जाने कितनी गालियाँ देते होंगे, इस पर कबीर कहते हैं

3. ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय,
औरन को सीतल करे आपहुं सीतल होय।
कबीर कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति के लिए हमें ऐसी बातें नहीं बोलनी चाहिए जिससे सुनने वाले को दुख हो और आप अपना आपा ही खो बैठें। हमें हमेशा ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो सामने को खुशी दे, जब आप दूसरे व्यक्ति के लिए अच्छी बातें बोलेंगे तो आपको भी अच्छा लगेगा। हमें अपने घरों में ये बातें सिखानी चाहिए ताकि वो किसी की जाति या धर्म देखकर उसके प्रति नफ़रत ज़ाहिर ना करे। क्योंकि जिन्हें आप जातिवादी ताने देते हैं अगर उन्होंने प्रतिकार किया तो आप पर भारी पड़ सकता है। कबीर का ये दोहा इस संदर्भ में भी समझा जा सकता है, वो कहते हैं

4. तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखीन पड़े, तो पिर घनेरि होय।
कबीर कहते है कि हमारे पाँव के नीचे जो छोटा सा तिनका दबा हुआ रहता है हमें उसकी भी कभी निंदा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यदि वही छोटा तिनका उड़ कर हमारी आखों में आ गया तो ज़बरदस्त दर्द झेलना पड़ेगा। यानी हमें आपस में बिना किसी द्वेष के रहना चाहिए और समाज में हर किसी का सम्मान करना चाहिए। कबीर यहाँ धैर्य का संदेश भी देते हैं, वो कहते हैं

5. धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

कबीर कहते है कि किसी भी काम को पूरा होने के लिए निश्चित समय लगता है, उससे पहले कुछ भी नहीं हो सकता। इसलिए हमें अपने मन में धैर्य रखना चाहिए और अपने काम को पूरी निष्ठा से करते रहना चाहिए। कबीर उदाहरण देते हैं कि यदि माली किसी पेड़ को सौ घड़ा पानी सींचने लगे तो क्या उस पर तुरंत फल आ जाएगा? नहीं तब भी उसे ऋतू आने पर ही फल मिलेगा। इसलिए हमें धीरज रखते हुए अपने कार्य को करते रहना चाहिए, समय आने पर फल जरूर मिलेगा।

इस दोहे से हम ये भी समझ सकते हैं कि कबीर तर्क और विज्ञानवाद को वैल्यू देते हैं। हिंदू धार्मिक ग्रंथों में मुख से बच्चे पैदा होने, सूर्य को खा जाने और पहाड़ को उँगली पर नचाने जैसी कहानियों का बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है लेकिन कबीर कहते हैं तर्क का इस्तेमाल करो और पाखंडवाद से दूर हो। एक दोहे में कबीर कहते हैं

6. पाथर पूजे हरि मिले , तो मैं पूजू पहाड़ .
घर की चाकी कोई ना पूजे, जाको पीस खाए संसार
कबीर यहाँ पाखंडवाद पर कड़ा प्रहार करते हैं, वो कहते हैं कि अगर पत्थर पूजने से भगवान मिल जाता तो मैं तो पूरा पहाड़ ही पूजने लगूँ लेकिन ऐसा नहीं है और ऐसे पत्थर जिसकी पूजा होती है, उससे तो वो पत्थर ज़्यादा उपयोगी है जिससे चक्की के पाट बने हैं और पूरी दुनिया उससे गेहूं को पीस का आटा बनाती है और फिर अपना पेट भरती है। तो कबीर हम सबको यही समझाते हैं कि फ़िज़ूल की बातों में कुछ नहीं रखा और हमें अपने दिमाग़ का इस्तेमाल करना चाहिए। कबीर अंधविश्वास से भी दूर रहने की सलाह देते हैं। एक दोहे में वो कहते हैं

7. माटी का एक नाग बनाके, पूजे लोग लुगाया ।
जिन्दा नाग जब घर में निकले, ले लाठी धमकाया ।।
कबीर इस दोहे के ज़रिए कहते हैं कि लोग पूजा पाठ में आडंबर और दिखावा करते है, मसलन सांप की पूजा करने के लिए वे माटी का सांप बनाते है। लेकिन वास्तव में जब वही सांप उनके घर चला आता है तो उसे लाठी से पिट पिट देते हैं। यहाँ कबीर लोगों के दोगलेपन को दिखाने की कोशिश करते हैं। कबीर सांप्रदायिकता के भी विरोधी थे और एक दोहे में समझाते हैं कि कैसे हिंदू और मुसलमान धर्म के नाम पर आपस में लड़ रहे हैं। वो कहते हैं

8. हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमान,
आपस में दोउ लड़ी मुए, मरम न कोउ जान।
कबीर कहते हैं कि हिन्दू कहता है कि मेरा ईश्वर राम है और मुस्लिम कहता है मेरा ईश्वर अल्लाह है – इसी बात पर दोनों धर्म के लोग लड़ कर मर जाते है उसके बाद भी कोई सच नहीं जान पाता। कबीर ये बात आज से 500 साल पहले कह रहे थे लेकिन आज भी उनकी बात एक दम सच है। हिंदू-मुस्लिम धर्म के नाम पर आपस में लड़ रहे हैं इससे समाज में नफ़रत फैल रही है। हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। धर्म के अलावा कबीर जाति के सवाल पर भी बहुत ज़ोर देते हैं और एक समतामूलक समाज को बनाने की प्रेरणा देते हैं। एक दोहे में वो कहते हैं –

9. मल मल धोए शरीर को, धोए न मन का मैल ।
नहाए गंगा गोमती, रहे बैल के बैल ।।
कबीर यहाँ उन जातिवादियों की पोल खोलते हैं जो कहते हैं कि गंगा जैसी नदियों में नहाने से सारे पाप धुल जाते हैं। पाप धोने के इस विचार ने अन्याय को और बढ़ाया है क्योंकि शोषणकारी को लगता है कि वो मेहनतकश तबके पर चाहे जितना ज़ुल्म कर ले, धार्मिक रूप से उसका कुछ नुक़सान नहीं होगा और गंगा जैसी नदियों में नहाकर, हवन-पूजा करके अपने सारे कुकर्मों को धो डालेगा। लेकिन कबीर इस मानसिकता पर चोट करते हुए कहते हैं कि गंगा या गोमती में रहने से तुम्हारे मन का मैल नहीं धुलने वाला, फिर भी तुम एक बुरे आदमी ही रहोगे। कबीर ये भी बताते हैं कि कैसे पाखंडवाद के नाम पर कुछ लोग हमें बेवकूफ बनाते रहते हैं। एक दोहे में वो कहते हैं

10. कबीरा कहे ये जग अंधा, अंधी जैसी गाय, बछड़ा था सो मर गया…झूठी चाम चटाय

कबीर यहां आगाह करते हैं कि कुछ लोग इस दुनिया को अपनी दुकान चलाने के लिए अंधा बनाए हुए हैं। वो उदाहरण देते हुए समझाते हैं कि जैसे जब गाय का बछड़ा मर जाता है तो उसका दूध निकालने के लिए लोग बछड़े की खाल में भूसा भरके गाय के सामने रख देते हैं और गाय उसे बछड़ा समझकर चाटती रहती है और मालिक उसका दूध निकाल लेता है। कबीर यहां समझाते हैं कि जिस तरह से विवेकहीन गाय सच नहीं पहचान पाती उस तरह से लोग ये नहीं समझ पाते कि कैसे धर्म और पाखंडवाद के नाम पर उनका मूर्ख़ बनाया जा रहा है। गाय की तरह पाखंडी लोग लोगों को बेवकूफ बनाकर उनका दूध यानी धन और संपत्ति लूटते रहते हैं। धार्मिक गुरुओं और मंदिर-मठों में दंडवत होने वाले बहुजन समाज के लोगों के लिए कबीर की ये सीख आज सबसे ज्यादा अहम हो जाती है। हमें ये पहचानना होगा कि कौन हमें गाय की तरह बेवकूफ बना कर मलाई खा रहा है।

तो कबीर के ये दोहे जितने 500 साल पहले ज़रूरी थे, उतने आज भी हैं। हमें उम्मीद है कि इन दोहों से आपको कुछ ना कुछ अच्छी सीख ज़रूर मिली होगी। बहुजन परंपरा से आने वाले कबीर जैसे महानायकों की वाणी हम सबके लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है। समतामूलक समाज को बनाने का ख़्वाब जो हमारे महानायक और महानायिकाओं ने देखा था, उसे हम उन्हीं के विचारों पर चलकर सच कर सकते हैं।

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