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दिवाली या दीपदानोत्सव? भिक्खु चंदिमा थेरो के लेख से पूरी बहस को समझिए

इस बहस पर भिक्खु चन्दिमा थेरों ने कुछ जरूरी बातें साझा की हैं जिन्हें पढ़ने के बाद आपको पूरी बहस समझ में आ जाएगी।

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www.theshudra.com (Photo-Canva)

दिवाली या दीपदानोत्सव? क्या कुछ लोग दीपदानोत्सव के बहाने दिवाली मना रहे हैं? भिक्खु चन्दिमा थेरों ने इस बारे में जरूरी बातें साझा की हैं। फेसबुक पर वो लिखते हैं

‘मैं इस संदर्भ में दो विचारों को सुनता और पढ़ता रहा हूँ। पहला – कुछ लोगों का मानना है कि महाराजा अशोक ने इसी दिन 84 हजार स्तूपों का अनावरण किया था, जिसकी सजावट दीपों एवं पुष्प मालाओं से किया गया था। इसलिए इसे दीपदानोत्सव कहते हैं। लेकिन सवाल उठता है कि क्या अशोक धम्म दीक्षा ग्रहण करने के बाद हर स्थापना दिवस पर दीपदानोत्सव करते रहे? जवाब है इसका कोई भी प्रमाण बौद्ध ग्रंथों में नहीं मिलता। अशोक ने जिस दिन पाटलीपुत्र में स्तूपों का अनावरण किया था उसी दिन धम्म दीक्षा भी ग्रहण की थी.

 उस महान दिवस को अशोक धम्म विजय दशमी के नाम से जाना जाता है, अर्थात वो दिन कार्तिक मास की आमावस्या नहीं बल्कि दसमी का दिन था, फिर आमावस्या के दिन दीपदानोत्सव क्यों? 

इस बारे में दूसरा मत ये है कि कुछ लोगों का मानना है कि इसी दिन तथागत गौतम बुद्ध संबोधि प्राप्ति के 7वे वर्ष बाद कार्तिक अमावस्या को कपिलवस्तु पधारे थे, त्रिपिटक ग्रन्थों का कहना है कि राजकुमार सिद्धार्थ को वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्धत्व की प्राप्ति हुई। उन्होंने सारनाथ में अषाढी पूर्णिमा को प्रथम उपदेश दिया तथा प्रथम वर्षावास भी सारनाथ में ही व्यतीत किया। कार्तिक पूर्णिमा तक तथागत सारनाथ में ही रूके रहे, उन्होंने कार्तिक पूर्णिमा को ही चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय का उपदेश दिया। तदोपरान्त वह सद्धम्म के प्रचार-प्रसार हेतु कपिलवस्तु न जाकर मगध की ओर चले गए।

इस प्रकार यह कहना बिलकुल ही निराधार है कि तथागत बुद्ध कार्तिक अमावस्या को कपिलवस्तु गए थे। मैंने जितना भी प्राचीन बौद्ध साहित्य या त्रिपिटक साहित्य को पढ़ा है, दीपदानोत्सव के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती. मै यह भी स्वीकार करता हूँ कि महाराजा अशोक ने अनावरण के समय दीपदानोत्सव कराया होगा लेकिन प्रति वर्ष ऐसा उत्सव देखने को नहीं मिला जबकि वह कई वर्ष जीवित रहे. फिर आजकल के लोग दीपदानोत्सव मनाने के लिए इतना व्याकुल क्यों है? क्या इससे अवसरवादी लोगों को बल नहीं मिलेगा?

आज भी आप लोग जब कोई नया विहार या आवास बनाते हैं तो उसके उद्घाटन या अनावरण  के अवसर पर साज-सज्जा करते हैं, लेकिन प्रति वर्ष इस प्रकार का उत्सव देखने को नहीं मिलता। 

यदि दीपदानोत्सव का संबंध तथागत बुद्ध या अशोक के जीवन से संबंधित होता तो तथागत बुद्ध के अनुयायी जिनजिन देशों में गये वहाबुद्ध पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा,आषाढ़ पूर्णिमाआदि की भातिं यह पर्व भी धूमधाम से मनाया जाता लेकिन किसी भी बौद्ध देश में दीपदानोत्सव नहीं मनाया जाता है.

इसलिए मै इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि दीपावली का संबंध बुद्धधम्म से नहीं है. इसलिए मेरा मत है कि सांस्कृतिक घालमेल करने से अच्छा है कि दीपदानोत्सव  का आयोजन इन प्रमुख दिवस पर किया जा सकता हैं जैसे वैशाख पूर्णिमा, आषाढी पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, अशोक धम्मविजय दसमी तथा14 अप्रैल कोउपासकउपासिकाओं को चाहिए कि वह प्रत्येक अमावस्या की भातिं इस अमावस्या को भी उपोसथ दिवस के रूप में ही मनाते हुए आठ शीलो का पालन करे।

सायं त्रिरत्न वंदना, परितपाठ, ध्यान साधना तथा धम्म चर्चा करे. घनसारप्पदित्तेन दीपेन तमधंसिना, तिलोकदीपं सम्बुद्धं पूजयामि तमोनुदं इन गाथाओं के साथ भगवान बुद्ध के सम्मुख दीप प्रज्वलित करें।

धम्मा लर्निंग सेंटर सारनाथ के संस्थापक अध्यक्ष भिक्खु चन्दिमा थेरो के इस लेख और तर्कों पर आपकी क्या राय है? दिवाली बनाम दीपदानोत्सव पर अपनी राय कमेंट के ज़रिए साझा करें।

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